कौशांबी , अप्रैल 7 -- मध्ययुगीन हिंदी साहित्य की भक्त परंपरा के महान संत मलूकदास की 452वीं जयंती मंगलवार को उनकी जन्मस्थली कौशांबी जिले के कड़ा में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देश-विदेश से आए अनुयायियों ने भाग लिया। इस अवसर पर भजन-कीर्तन, ध्यान-योग तथा संत मलूकदास के कृतित्व और व्यक्तित्व पर व्याख्यान आयोजित किए गए। वक्ताओं ने कहा कि संत मलूकदास जीवनभर दीन-दुखियों की सेवा और उनके कष्टों को दूर करने में समर्पित रहे। उनकी वाणी में मानवता, सेवा और सादगी का संदेश निहित है।
इस दौरान उनके प्रसिद्ध दोहों का भी पाठ किया गया, जिनमें-"भूखेहि टूक, प्यासहिं पानी,यहै भगति हरि के मन माहीं।"तथा"जेते सुख संसार के, इकट्ठे किए बटोर,कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर।" जैसे दोहों के माध्यम से उन्होंने भौतिकता से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन अपनाने का संदेश दिया।
संत मलूकदास के प्रति उनकी भक्ति और समर्पण इस दोहे में भी झलकता है- "माला जपूँ न कर जपूँ, जिह्वा कहूँ न राम,सुमिरन मेरा हरि करें, मैं पायो विश्राम।"कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही और पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बना रहा।
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