, March 9 -- वर्ष 1940 में हिमांशु राय की आकस्मिक मौत के बाद देविका रानी ने बांबे टॉकीज को अपने सहयोगियो की मदद से चलाया और पुनर्मिलन,बंधन,कंगन,झूला,बसंत और किस्मत जैसी सफल फिल्मों का निर्माण किया । फिल्म ..किस्मत ..बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी फिल्मों में सबसे कामयाब फिल्म साबित हुयी ।किस्मत..ने बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ते हुये कोलकाता के एक सिनेमा हॉल में लगभग चार वर्ष तक लगातार चलने का रिकार्ड कायम किया जो काफी समय तक टिका रहा।
वर्ष 1944 में देविका रानी ने फिल्म ..ज्वार भाटा ..का निर्माण किया । फिल्म ..ज्वारा भाटा..हांलाकि असफल फिल्म थी लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ..ज्वार भाटा .. अमूल्य धरोहर के रूप में आज भी याद की जाती है क्योंकि इसी फिल्म से अभिनय सम्राट दिलीप कुमार ने अपने सिने करियर की शुरूआत की थी और दिलीप कुमार को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का श्रेय देविका रानी को दिया जाता है । वर्ष 1945 में देविका रानी बांबे टॉकीज से अलग हो गयी। देविका रानी का मानना था महज पैसा कमाना बांबे टॉकीज का एकमात्र लक्ष्य नही है।हिमांशु राय ने उन्हें सिखाया था कि फिल्म व्यावसायी तौर पर सफल होनी चाहिये लेकिन यह सफलता कलात्मक मूल्यों की बलि देकर नही हासिल की जानी चाहिये । देविका रानी को जब यह महसूस हुआ कि जब वह इन मूल्यों की रक्षा नही कर पा रही है तो उन्होंने बांबे टॉकीज को अलविदा कह दिया।
पति की मौत और बांबे टॉकीज को छोड़ने के बाद देविका रानी लगभग टूट सी गयी थी । इस बीच उनकी मुलाकात रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाब रोरिक से हुई। बाद में देविका रानी ने उनसे विवाह कर लिया और फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। फिल्म इंडस्ट्री में उत्कृष्ट योगदान देने के लिये भारत सरकार ने वर्ष 1969 में जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार की शुरूआत की तो इसकी सर्वप्रथम विजेता ..देविका रानी ..बनी ।इसके अलावा देविका रानी फिल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनी जिन्हे पदमश्री से नवाजा गया। अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के दिलो पर राज करने वाली देविका रानी 09 मार्च 1994 को इस दुनिया को अलविदा कह गयी।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित