शिमला , फरवरी 27 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की दायर उस अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, जिसमें मध्यस्थता के मामले में एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने में 300 से अधिक दिनों की देरी को माफ करने का अनुरोध किया गया था।

मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी. नेगी की खंड पीठ ने शुक्रवार को अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार इतनी लंबी देरी के लिए कोई विश्वसनीय और ठोस वजह नहीं बता पायी है। अपील 323 दिनों की देरी से दायर की गई थी, जबकि राज्य सरकार ने अपने आवेदन में 293 दिनों की देरी स्वीकार की थी। अदालत ने पांच पृष्टों वाले अपने आदेश में कहा, "हम इस मामले को गुण-दोष के आधार पर सुनने के इच्छुक नहीं हैं, विशेष रूप से राज्य की घोर निष्क्रियता को देखते हुए, यहां तक कि प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन भी लगभग दस महीने की अवधि के बाद 16 सितंबर, 2025 को किया गया। "पीठ ने इस तथ्य पर भी संज्ञान लिया कि पांच नवंबर, 2024 के निर्णय की प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन 16 सितंबर, 2025 को यानी फैसले के लगभग दस महीने बाद किया गया। वहीं, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि उसे महाधिवक्ता के कार्यालय द्वारा उसकी आपत्तियों के खारिज होने की सूचना नहीं दी गयी थी और उसे निर्णय की जानकारी जुलाई 2025 में निष्पादन याचिका दायर होने के बाद ही मिली।

अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अपने अधिवक्ता के संपर्क में रहना और लंबित मुकदमों की निगरानी करना विभाग की जिम्मेदारी है।

उल्लेखनीय है कि विवाद 31 जनवरी, 2024 के मध्यस्थता निर्णय से संबंधित है, जिसके तहत 30 अक्टूबर, 2013 को पूर्ण किए गए कार्यों के चालू बिलों के संबंध में राज्य पर 66,35,351 रुपये की वित्तीय देनदारी निर्धारित की गयी थी। राज्य सरकार ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत इस निर्णय को चुनौती दी थी, लेकिन 23 दिनों की देरी के आधार पर उसकी आपत्तियां एकल न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दी गयी थी।

उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए कहा कि सरकारी विभाग केवल नौकरशाही प्रक्रियाओं के आधार पर विशेष रियायत की मांग नहीं कर सकते।

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