कोलकाता , नवंबर 15 -- पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर केंद्र से पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय के मताधिकार और कानूनी स्थिति की रक्षा के लिए तत्काल हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है और इस समुदाय के लोगों को एसआईआर से छूट देने की मांग की है।

श्री चौधरी ने मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतुआ समुदाय की 'दयनीय दुर्दशा' का जिक्र करते हुए चेतावनी दी कि लाखों लोग दस्तावेजी आवश्यकताओं को पूरा न कर पाने के कारण मताधिकार से वंचित होने का जोखिम उठा रहे हैं।

श्री चौधरी ने कहा कि विभाजन के दौरान और फिर 1971 के युद्ध के दौरान 'क्रूर और निरंतर उत्पीड़न' के कारण तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से पलायन करने वाले मतुआ समुदाय के लोगों को एसआईआर के तहत अनिवार्य दस्तावेज उपलब्ध कराने के 'असंभव कार्य' का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने तर्क दिया कि सताए गए प्रवासियों के रूप में, कई लोगों के पास पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं और नए मानदंड पीढ़ियों से उनके द्वारा प्राप्त अधिकारों का प्रयोग जारी रखने की उनकी क्षमता को खतरे में डालते हैं।

पत्र के अनुसार इस संकट ने अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के बैनर तले समुदाय को 'अपने भविष्य पर छाई अनिश्चितता' की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए आमरण अनशन का सहारा लेने के लिए प्रेरित किया है।

श्री चौधरी ने लिखा कि कड़े दिशानिर्देशों ने यह डर पैदा कर दिया है कि मतुआ लोगों को 'अवैध करार' दिया जा सकता है और उनसे मतदान के अधिकार सहित बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए जा सकते हैं।

श्री चौधरी ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समुदाय के दीर्घकालिक एकीकरण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मतुआ लोग दशकों से चुनावों में भाग लेते रहे हैं, विधायक और सांसद रहे हैं, और विभिन्न राजनीतिक धाराओं का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा,"उन्हें (मतुआ लोग) बार-बार 'राजनीतिक मोहरे' के रूप में इस्तेमाल किया गया है।"श्री चौधरी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पंचायत और नगरपालिका चुनावों सहित सभी चुनावों में मतदान करने के बावजूद बड़ी संख्या में मतुआ लोगों के नाम 2002 की मतदाता सूची से गायब हैं जो एसआईआर का आधार दस्तावेज है। उन्होंने लिखा कि उन्हें लगभग 25 साल पुराने दस्तावेज दिखाने के लिए मजबूर करना 'क्रूर और अनुचित' है, खासकर उन कठिनाइयों को देखते हुए जिनके तहत वे पलायन कर गए थे।

कांग्रेस नेता ने मानवीय आधार और ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए गृह मंत्री से मतुआ लोगों को एसआईआर की 'जटिलता' से मुक्त करने का आग्रह किया। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के कार्यान्वयन की चल रही प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों की नागरिकता निर्धारित करने की अंतिम तिथि हाल ही में 31 दिसंबर, 2014 से बढ़ाकर 31 दिसंबर, 2024 कर दी गई है।

श्री चौधरी ने इसी आधार पर प्रस्ताव दिया कि सरकार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र से पहले एक अध्यादेश के माध्यम से मतुआ लोगों को भारतीय नागरिक माने। उन्होंने कहा कि समुदाय ने उनकी बात सुने जाने की उम्मीद में अपनी भूख हड़ताल अस्थायी रूप से वापस ले ली है और ऐतिहासिक एवं सामाजिक वास्तविकताओं पर आधारित एक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की अपील की।

उन्होंने गृह मंत्री को याद दिलाया कि पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति की आबादी में मतुआ सबसे बड़ा हिस्सा हैं और दशकों से देश में समाज के योगदानकर्ता सदस्य के रूप में रह रहे हैं।

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