शैलेश कुमार सिंह सेपटना , नवंबर 13 -- कभी भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिसिर के कालजयी गीतों को अपने कोख में समेटने वाली भोजपुरी दशकों से बजाये जा रहे भोंडे गानों से उभर आये अपने जख्मों को कुरेद कर कराहती रहती है और ऐसे समय में मनोज भावुक की रचनाएँ, न केवल इन जख्मों पर मरहम लगाती हैं, बल्कि इस भाषा की मधुरता और सांस्कृतिक समृधि को भी श्रोताओं के सामने लाने का प्रयास करती हैं।

मनोज भावुक समकालीन भोजपुरी साहित्य और गीत गवनई के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। सन 2004 में प्रकाशित उनके पहले भोजपुरी गजल संग्रह 'तस्वीर जिन्दगी के' को 2006 में मशहूर गजल लेखक और गीतकार गुलज़ार के हाथों भारतीय भाषा परिषद सम्मान मिला था। सम्मान पाने के बाद श्री भावुक ने पीछे मुड़ कर नही देखा और वह पिछले दो दशकों में हजारों भोजपुरी गीत और गज़ल लिख चुके हैं। 2024 में प्रकशित उनकी पुस्तक 'भोजपुरी सिनेमा के संसार' 1931 से अब तक हिंदी सिनेमा पर भोजपुरी गानों के प्रभाव और 1962 में प्रदर्शित पहली भोजपुरी फ़िल्म 'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो' से लेकर 2019 तक के इतिहास की चर्चा करती है।

श्री भावुक ने यूनीवार्ता से बातचीत में कहा कि कभी निर्गुण, पूरबी, चैती और फगुआ के साथ शादी विवाह के मीठे गीतों के लिए जानी जाने वाली भोजपुरी का परिचय आज भोंडे गानों से दिया जाता है। सडक, चौक चौराहों पर बजाये जाने वाले गाने उस भोजपुरी संस्कृति के प्रतिनिधि नहीं है, जिसकी भोजपुरी हकदार है। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश है कि भोजपुरी सिनेमा को बदनाम कर रहे भोंडे गीतों के प्रचलन के बीच साफ सुथरी रचनाएँ लिख कर एक नयी लकीर खिंची जाये।

श्री भावुक कहते हैं कि भोजपुरी भाषियों के बीच उनके साफ सुथरे गीतों की लोकप्रियता कहती है कि श्रोताओं से ज्यादा दोषी वैसे लोग हैं, जो सस्ती लोकप्रियता के लिए भोंडे गाने परोस रहे हैं। अभी हाल ही में आई भोजपुरी फ़िल्म 'आपन कहाए वाला के बा' के सभी लोकप्रिय और साफ सुथरे गाने श्री भावुक ने लिखे हैं और उस पैबंद को भोजपुरी के सर से हटाने की कोशिश की है, जिस पर भोंडे की मुहर लगी हुई है।

इतना ही नहीं मनोज भावुक के 'पलायन के दर्द से ओतप्रोत भोजपुरी गीत बिहार चुनाव के दौरान भी खूब बजते रहे। 'गाँवे में कब मिली रोजी-रोजगार हो/ का जाने, कब जागी यूपी-बिहार हो।' "कब ले पलायन के दुख लोग झेले, कब ले सुतल रहिहें एमपी-एमएलए" जैसे गानों को लोगों ने खूब सराहा गया। दरअसल श्री भावुक के भोजपुरी गीतों में प्रवासी बिहारियों का दर्द है, उनकी बेचैनी और छटपटाहट है।

श्री भावुक के छठ महापर्व के गाने भी खूब लोकप्रिय हुए। सुनs ए छठी मइया' और 'जागे यूपी-बिहार' उनके चर्चित छठ गीत हैं।

श्री भावुक कहते हैं कि बिहार और उतरप्रदेश (यूपी) में पलायन तो आजादी के बहुत पहले से जारी है, साहित्य में वह कभी गिरमिटिया तो कभी बिदेसिया-परदेसिया बन के सामने आया और इस समस्या पर लेखकों ने समाज के दर्द को जाहिर किया। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर का नाटक बिदेसिया क्या है ? पलायन और प्रवास की पीड़ा ही तो है। आप शौक से कहीं जाइये, कोई बात नहीं. लेकिन मजबूरी में घर छोड़ना बहुत दर्दनाक और पीड़ादायक होता है। इस पर उन्होंने एक दोहा लिखा है, 'पड़ल हवेली गाँव में भावुक बा सुनसान/लइका खोजे शहर में छोटी मुकी मकान।'उल्लेखनीय है कि मनोज भावुक मीडिया और फिल्मों में आने से पहले अफ्रीका और यूरोप में इंजिनियर रहे थे। भोजपुरी भाषा से अनुराग और सेवा की इच्छा से नौकरी छोड़ी और लगातार साफ सुथरे गाने लिख कर इस भाषा की खोई प्रतिष्ठा को वापस लाने में जुटे हैं।

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