भिण्ड , जनवरी 19 -- मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले की महिला एवं बाल विकास विभाग की अटेर परियोजना में गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। नयापुरा आंगनवाड़ी केंद्र पर पदस्थ एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को दो अलग-अलग नामों से जारी यूनिक कोड के माध्यम से पिछले दो से तीन वर्षों तक दोगुना मानदेय भुगतान किए जाने का खुलासा हुआ है। मामला उजागर होते ही विभाग में हड़कंप मच गया है। भिण्ड कलेक्टर ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया है, जबकि एक क्लर्क को नोटिस देकर निलंबित किया जा चुका है।

जानकारी के अनुसार अटेर परियोजना के पिथनपुरा सेक्टर अंतर्गत नयापुरा आंगनवाड़ी केंद्र पर पदस्थ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सावित्री देवी पवैया वर्ष 2010 से सेवाएं दे रही हैं। उनके नाम से विभागीय रिकॉर्ड में पहले से एक यूनिक कोड दर्ज था, जिसके आधार पर मानदेय का भुगतान होता रहा। जुलाई 2023 में बिना किसी अधिकृत प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेजों के विभागीय सिस्टम में एक नया यूनिक कोड जनरेट कर दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि दूसरा यूनिक कोड सावित्री गौर के नाम से बनाया गया, जबकि कार्यस्थल, बैंक खाता और भुगतान लाभार्थी वही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रहीं। इन दोनों यूनिक कोड के माध्यम से वर्ष 2023 से लगातार उनके खाते में दोगुना मानदेय जमा होता रहा। विभागीय रिकॉर्ड में दूसरे यूनिक कोड से संबंधित कोई नियुक्ति आदेश, आधार सत्यापन या अन्य अनिवार्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

तीन वर्षों तक लाखों रुपये का भुगतान चलता रहा, लेकिन सेक्टर सुपरवाइजर, परियोजना अधिकारी और संबंधित शाखा स्तर पर किसी ने भी इस वित्तीय अनियमितता को नहीं पकड़ा। जबकि भुगतान की निगरानी और सत्यापन की जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों की होती है।

मामला सामने आने के बाद विभागीय अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का दावा है कि उन्होंने समय रहते अपने उच्च अधिकारियों को इस गड़बड़ी की जानकारी दी थी। वहीं अटेर परियोजना अधिकारी राहुल गुप्ता ने तत्कालीन शाखा प्रभारी ओमप्रकाश शाक्य को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

ओमप्रकाश शाक्य का कहना है कि जिस अवधि में दूसरा यूनिक कोड जनरेट हुआ, उस समय वे दुर्घटना के कारण लंबे चिकित्सकीय अवकाश पर थे। उन्होंने मेडिकल दस्तावेजों के साथ जिला कार्यक्रम अधिकारी को जवाब सौंपते हुए आरोप लगाया है कि परियोजना अधिकारी द्वारा फोन पर आईडी और पासवर्ड मांगकर यह यूनिक कोड तैयार कराया गया।

प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी एवं अटेर परियोजना के सीडीपीओ राहुल गुप्ता ने बताया कि यह अत्यंत गंभीर मामला है। सामान्यतः यूनिक कोड जनरेट करते समय आधार कार्ड, बैंक खाता, पैन कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों का मिलान किया जाता है और किसी भी स्तर पर गड़बड़ी होने पर सिस्टम आवेदन को अस्वीकार कर देता है। इसके बावजूद दो अलग-अलग नामों से यूनिक कोड बनना और वर्षों तक भुगतान होना विभागीय लापरवाही को दर्शाता है। मामले की जांच जारी है और जांच पूरी होने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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