चेन्नई , मार्च 02 -- भारत में चार में से एक स्तन कैंसर मरीज़ों को इस बीमारी से संबंधित आनुवंशिक जोखिम विरासत में मिलता है। आईआईटी-मद्रास और कारिकिनोस हेल्थकेयर की एक संयुक्त रिसर्च में यह खुलासा हुआ है।

यह भारत में हुए सबसे बड़े स्तन कैंसर जीनोमिक अध्ययनों में से एक है। चेन्नई का कुमार अस्पताल और चेन्नई स्तन केन्द्र भी इस अध्ययन में शामिल थे। अध्ययन ने खुलासा किया है कि भारत के 25 प्रतिशत स्तन कैंसर मरीज़ों में कैंसर के जोखिम से जुड़ा वंशानुगत आनुवंशिक रूप मौजूद होता है। इनमें से कैंसर के ज्यादातर रूप (वेरिएंट) जाने-माने बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन से अलग होते हैं।

इस अध्ययन पत्र को आईआईटी-मद्रास के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के जॉन पीटर, जयलक्ष्मी जोथी, अवराजित चक्रवर्ती, एस महालिंगम, कार्किनोस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड से बानी जॉली, राजदीप राहा, विनोद स्कारिया, श्रीधर सिवासुब्बू, कुमारन हॉस्पिटल, चेन्नई के ऑन्कोलॉजी विभाग के स्वामीनाथन गणपति रमन और चेन्नई स्तन केन्द्र के सेल्वी राधाकृष्णन ने मिलकर लिखा है।

अध्ययन के तहत 479 स्तन कैंसर रोगियों के जर्मलाइन डीएनए का विश्लेषण किया गया, जिनके नमूने आईआईटी मद्रास स्थित नेशनल कैंसर टिश्यू बायोबैंक से प्राप्त किये गये थे। इसे देश में तैयार किये गये अब तक के सबसे व्यापक वंशानुगत स्तन कैंसर डाटासेट में से एक बताया गया है।

यह अध्ययन 'भारत कैंसर जीनोम एटलस' का हिस्सा बन गया है, जिसे भारत का पहला और सबसे बड़ा मुक्त-स्रोत कैंसर जीनोम डाटा संसाधन माना जा रहा है। अध्ययन दल ने 97 कैंसर संवेदनशीलता जीनों की जांच की, जिनमें बीआरसीए1, बीआरसीए2 और होमोलॉगस रिकॉम्बिनेशन रिपेयर पाथवे से जुड़े 15 जीन शामिल थे। जीन परिवर्तनों का वर्गीकरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत एसीएमजी/एएमपी दिशानिर्देशों के अनुरूप किया गया।

शोध में पाया गया कि 24.6 प्रतिशत रोगियों में कम से कम एक रोगकारी या संभावित रोगकारी जीन परिवर्तन मौजूद था। इनमें से केवल 8.35 प्रतिशत में बीआरसीए1 या बीआरसीए2 जीन परिवर्तन पाये गये, जबकि 11.9 प्रतिशत रोगियों में होमोलॉगस रिकॉम्बिनेशन रिपेयर पाथवे से जुड़े अन्य जीनों में वंशानुगत परिवर्तन पाए गए। कुल सकारात्मक मामलों में से 67 प्रतिशत बीआरसीए जीन के अतिरिक्त अन्य जीनों, जैसे एमएलएच1, एनएफ1, टीपी53 और आरबी1 से संबंधित थे।

अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रो. महालिंगम ने कहा कि निष्कर्षों का प्रत्यक्ष प्रभाव नैदानिक अभ्यास, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और राष्ट्रीय कैंसर दिशानिर्देशों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि केवल बीआरसीए आधारित परीक्षण के बजाय बहु-जीन पैनल या एक्सोम आधारित जर्मलाइन परीक्षण की दिशा में बढ़ने की आवश्यकता है।

प्रथम लेखक डॉ. जॉन पीटर ने कहा कि अध्ययन में कैंसर जोखिम के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जोखिम भी सामने आए। 21 प्रतिशत से अधिक रोगियों में गैर-कैंसर जीनों में ऐसे परिवर्तन पाये गये जो मार्फान सिंड्रोम, मैलिग्नेंट हाइपरथर्मिया संवेदनशीलता, वंशानुगत हृदय अतालता और फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया जैसी स्थितियों से जुड़े हैं। लगभग आठ प्रतिशत रोगी बायोटिनिडेज़ कमी और विल्सन रोग जैसे अप्रभावी आनुवंशिक विकारों के वाहक पाये गये।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कई रोगकारी जीन परिवर्तन भारतीय या दक्षिण एशियाई आबादी के लिए विशिष्ट हैं और वैश्विक डाटाबेस में या तो अनुपस्थित हैं या अत्यंत दुर्लभ हैं।

अध्ययन में दवा-संबंधी जीन संकेतकों (फार्माकोजीनोमिक मार्कर) का भी आकलन किया गया, जो कीमोथेरेपी की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही वैश्विक आबादी से तुलना के लिए जिनोमैड डाटाबेस का उपयोग किया गया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि निष्कर्ष भारत और दक्षिण एशिया के लिए विशिष्ट जीन वेरिएंट डाटाबेस और व्याख्या ढांचे की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं, ताकि जोखिम आकलन अधिक सटीक हो सके।

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