नयी दिल्ली , दिसंबर 06 -- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि के आंकड़े उन बुनियादी परिवर्तनों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देश में पिछले 10 साल में हुए हैं, और यह दर्शाता है कि भारत दुनिया की आर्थिक वृद्धि का एक मजबूत इंजन बन गया है।

श्री मोदी ने यहां एक मीडिया हाउस के आयोजन को संबोधित करते हुए कुछ दिन पहले जारी दूसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों का उल्लेख किया जिनमें 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है। प्रधानमंत्री ने कहा, "ये आंकड़े प्रगति की नयी गति को दर्शाते हैं। यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक मजबूत व्यापक आर्थिक संकेत है - एक संदेश कि भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि का इंजन बन रहा है।"उन्होंने कहा कि ये आंकड़े ऐसे समय में आये हैं जब वैश्विक वृद्धि दर लगभग तीन प्रतिशत और जी-7 देशों की वृद्धि औसत डेढ़ प्रतिशत के आसपास है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत उच्च वृद्धि और कम मुद्रास्फीति का मॉडल बनकर उभरा है। श्री मोदी ने याद किया कि एक समय अर्थशास्त्री ऊंची मुद्रास्फीति को लेकर चिंतित रहते थे, लेकिन आज वही अर्थशास्त्री देश की कम मुद्रास्फीति की चर्चा करते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की उपलब्धियां साधारण नहीं हैं, और न ही वे केवल आंकड़ों की बात हैं, बल्कि वे उस बुनियादी परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो देश में पिछले दशक में आया है। यह बुनियादी परिवर्तन लचीलापन, समस्याओं का समाधान खोजने की प्रवृत्ति, आशंकाओं के बादल हटाने और आकांक्षाओं को विस्तार देने के बारे में है।

उन्होंने कहा कि इसी वजह से आज का भारत स्वयं को बदल रहा है और आने वाले कल को भी रूपांतरित कर रहा है। इस परिवर्तन में विश्वास की नींव आज किये जा रहे कार्यों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि आज के सुधार और आज का प्रदर्शन कल के परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

श्री मोदी ने कहा कि भारत की एक बड़ी क्षमता लंबे समय तक अप्रयुक्त रही। जब इस अप्रयुक्त क्षमता को अधिक अवसर मिलते हैं, और जब यह बिना बाधा देश के विकास में पूरा योगदान देती है, तो देश का परिवर्तन निश्चित है।

उन्होंने मीडिया से पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर, गांवों, टियर-2 और टियर-3 शहरों, महिला शक्ति, नवाचारी युवाओं, समुद्री शक्ति और ब्लू इकोनॉमी तथा अंतरिक्ष क्षेत्र पर विचार करने का आग्रह किया - जिनकी पूरी क्षमता पिछले दशकों में उपयोग नहीं की गयी।

प्रधानमंत्री ने कहा, "आज भारत इस अप्रयुक्त क्षमता को उपयोग में लाने की दृष्टि से काम कर रहा है। पूर्वी भारत में आधुनिक बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और उद्योग में अभूतपूर्व निवेश किया जा रहा है। गांवों और छोटे शहरों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जा रहा है। छोटे शहर स्टार्टअप और एमएसएमई के नये केंद्र बन रहे हैं। किसानों के एफपीओ बन रहे हैं, जो उन्हें सीधे वैश्विक बाजारों से जोड़ रहे हैं।"प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है। पहले सुधार प्रतिक्रियात्मक होते थे - या तो राजनीतिक हितों के कारण या संकट प्रबंधन के लिए। आज सुधार राष्ट्रीय लक्ष्यों को ध्यान में रखकर किये जा रहे हैं। हर क्षेत्र में सुधार हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि तीन-चार दिन पहले ही "स्मॉल कंपनी" की परिभाषा में बदलाव किया गया है, जिससे हजारों कंपनियां सरल नियम, तेज प्रक्रियाएं और बेहतर सुविधाओं के दायरे में आ गयी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि लगभग 200 उत्पाद श्रेणियों को अनिवार्य गुणवत्ता नियंत्रण आदेश से बाहर कर दिया गया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की यात्रा केवल विकास की नहीं, बल्कि सोच में परिवर्तन और एक मानसिक पुनर्जागरण की भी यात्रा है।

उन्होंने यह भी कहा कि इतनी तेज वृद्धि के बावजूद आज कोई इसे "हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ" नहीं कहता। यह शब्द तब इस्तेमाल होता था, जब भारत दो-तीन प्रतिशत की वृद्धि के लिए संघर्ष करता था। प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी देश की आर्थिक वृद्धि को उसके धर्म या लोगों की पहचान से जोड़ना क्या अनजाने में हो सकता है? यह उपनिवेशी मानसिकता का ही प्रतीक था। इसमें पूरे समाज और परंपरा को अकर्मण्यता और गरीबी से जोड़ने की कोशिश की गयी।

श्री मोदी ने कहा कि उपनिवेशी मानसिकता ने भारत की विनिर्माण प्रणाली को नष्ट किया। उपनिवेश काल में भी भारत हथियारों का बड़ा उत्पादक था, ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का विस्तृत नेटवर्क था, और भारत हथियारों का निर्यात करता था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद रक्षा निर्माण प्रणाली ध्वस्त कर दी गयी। उपनिवेशी मानसिकता के कारण सरकार ने भारत में बने हथियारों को महत्व नहीं दिया, और भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में शामिल हो गया।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत सदियों तक जहाज निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा था। पहले भारत के 40 प्रतिशत व्यापार का परिवहन भारतीय जहाजों से होता था। लेकिन विदेशी जहाजों को प्राथमिकता दी गयी, और परिणामस्वरूप आज भारत अपने 95 प्रतिशत व्यापार के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भर है - जिसके कारण हर वर्ष लगभग 75 अरब डॉलर (करीब छह लाख करोड़ रुपये) विदेशी शिपिंग कंपनियों को चुकाने पड़ते हैं।

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