चेन्नई , जनवरी 06 -- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा है कि भारत में विकसित कॉस्मिक डस्ट एक्सपेरिमेंट (डीईएक्स) ने बड़ी सफलता हासिल करते हुए पृथ्वी की कक्षा में ऑर्बिटल डेब्रिस (धूल कणों) के टकराव से उत्पन्न संकेतों का सफलतापूर्वक पता लगाया है।

यह प्रयोग पीएसएलवी-सी58 एक्सपोसैट मिशन के तहत पीएसएलवी कक्षीय प्रायोगिक मॉड्यूल (पोओईम) पर एक जनवरी 2024 को प्रक्षेपित किया गया था। इसरो ने इसे अंतरग्रहीय रहस्यों की खोज में एक ऐतिहासिक उपलब्धि करार दिया है। इस सफलता से यह भी प्रमाणित हुआ है कि डीईएक्स उपकरण अंतरिक्ष में मौजूद सूक्ष्म धूल कणों को पहचानने और उन्हें मापने में पूरी तरह सक्षम है।

इसरो के अनुसार, अंतर-गृहीय धूल कण (आईडीपी) धूमकेतुओं और छोटे तारों (एस्टरॉइड) से निकले सूक्ष्म कण होते हैं, जो पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय "उल्का परत" बनाते हैं और रात के आकाश में टूटते तारों के रूप में दिखाई देते हैं। डीईएक्स ऐसे अत्यधिक वेग वाले धूल कणों का अध्ययन करने वाला भारत का पहला स्वदेशी उपकरण है। इसरो ने बताया कि यह कॉम्पैक्ट उपकरण अंतरिक्ष में धूल कणों के टकराव को "सुनने" के लिए डिज़ाइन किया गया है और मात्र 4.5 वॉट बिजली खपत के साथ काम करता है। लगभग तीन किलोग्राम वज़न वाला यह डिटेक्टर हाइपर-वेलोसिटी सिद्धांत पर आधारित है।

डीईएक्स को पृथ्वी से लगभग 350 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया था। यह 140 डिग्री वाइड-व्यू वाला डिटेक्टर एक जनवरी से नौ फरवरी 2024 के बीच सक्रिय रहा और इस दौरान उसने कई बार धूल कणों के टकराव दर्ज किए। औसतन हर एक हजार सेकंड में एक टक्कर दर्ज की गयी। इसरो के अनुसार, डीईएक्स ने पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने वाले अंतरग्रहीय धूल कणों के नवीनतम और निर्णायक आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। यह पुष्टि करता है कि पृथ्वी पर लगातार बाह्य अंतरिक्ष से कणों की बौछार होती रहती है।

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