जयपुर , अप्रैल 09 -- राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने भारत को विश्व का मार्गदर्शक बताया है और कहा है कि आज विश्व हिंसा की अग्नि में जल रहा है, ऐसी परिस्थिति में आशा की एक किरण के रूप में भारत की सनातन संस्कृति और अहिंसा तथा अन्य सिद्धान्त बहुत अधिक प्रासंगिक हो गये है और इन सिद्धांतों को आचरण में उतारना बहुत आवश्यक है।

श्री देवनानी गुरुवार को जयपुर अणुविभा केन्द्र में सभी जैन पन्थों के आचार्य, साधु एवं साध्वी गण के सानिध्य में जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (जीतो) द्वारा आयोजित 'विश्व नवकार महामंत्र दिवस' के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहें थे। इस मौके पर नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप के साथ ही विश्व में शांति, सद्भाव एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का संदेश दिया गया।

उन्होंने कहा कि आज रूस, यूक्रेन, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव एवं वैश्विक शक्तियों के टकराव ने चारों ओर वातावरण और सम्पूर्ण मानवता को संकट एवं असुरक्षा की स्थिति में ला दिया हैं। ऐसे समय में भारत की सनातन संस्कृति विश्व को शांति और बन्धुत्व का मार्ग सीखा सकती है। उन्होंने कहा कि हम केवल तकनीकी ज्ञान से विश्व गुरु नहीं बन सकते बल्कि इसके लिए हमें अपनी आध्यात्मिक शक्ति और आन्तरिक शांति के ज्ञान को आत्मसात करना होगा।

श्री देवनानी ने कहा कि भारत ने कभी विश्व की महाशक्ति बनना नहीं चाहा। हम विश्व के मार्गदर्शक रहे हैं और आगे भी दुनिया को शांति, सद्भाव, अहिंसा और मानव कल्याण का मार्ग दिखाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि विश्व के वर्तमान हालात में भारत को कोई फर्क नहीं पड रहा है, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की निर्गुट नीति पर चल रहे हैं और आज दुनिया देख रही है कि सत्ता के लिए अपने पिता को भी मौत के घाट उतार देने वाले लोग आपस में ही लड़ मर रहें है।

उन्होंने भारत का नेतृत्व विश्व में शांति और मानवता के कल्याण का पक्षधर है। यह विश्व शांति और सद्भाव के लिए भारत की प्रतिबद्धता का ही द्योतक है कि केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह विश्व नमोकार मंत्र दिवस पर देश की राजधानी से हम सभी से जुड़े है।

श्री देवनानी ने कहा कि नवकार महामन्त्र का जप मानव जाति के कल्याण से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इस महामंत्र का जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी सारगर्भित है। यह आत्मा की गहराई से उठने वाली एक दिव्य पुकार और सकारात्मक ऊर्जा है। यह मंत्र यह सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का मंत्र है। इसलिए हम सभी को अपने मन को शुद्ध रख उसके साथ जीनें की कला को समझना होगा।

उन्होंने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति में "वसुधैव कुटुम्बकम्" और सारे विश्व का कल्याण हों यह भावना निहित है। जैन संत अहिंसा, सयंम, अपरिग्रह आदि सिद्धांतों से पूरी मानव जाति का मार्ग दर्शन कर रहें है। साथ ही जैन संतों में अध्ययन करने की प्रवृति अन्य संतों की तुलना में बहुत अधिक है।

उन्होंने कहा कि आज इस बात की आवश्यकता है कि नई पीढ़ी के युवाओं को भारत के सनातन के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया जाये। अहिंसा को सर्वोपरी माना गया है, इसमें केवल शारीरिक हिंसा नहीं बल्कि मन, वचन, कर्म की हिंसा का पूर्ण त्याग करने का बड़ा सन्देश छुपा हुआ है। अतः हमें क्रोध,द्वेष और अहंकार को छोड़ तथा संयम को जीवन में उतार कर तदनुरूप आचरण करना चाहिए। यह हम सभी के लिए अगले जन्म की आदर्श सीढ़ी साबित हो सकती है।

श्री देवनानी ने कहा कि जैन मुनि अपने मुंह पर पट्टी लगा कर किसी अंधविश्वास का नहीं बल्कि कीड़े जैसे छोटे से छोटे जीव के प्रति भी सहुष्णता का भाव और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का एक बड़ा सन्देश देते हैं। यही सिद्धांत आज आधुनिक विज्ञान की इकोलॉजी और बायोडायवर्सिटी से मेल खाता है।

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