नयी दिल्ली , जनवरी 9 -- उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय भाषाएं एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

श्री राधाकृष्णन ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक संवाद को सशक्त करने के उद्देश्य से आयोजित तीन दिवसीय (09 से 11 जनवरी तक) तृतीय अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन-2026 के उद्घाटन के अवसर पर कहा कि भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे स्मृति, संस्कृति, परंपरा और पीढ़ियों से हस्तांतरित मूल्यों की वाहक होती हैं। भारत की एकता कभी एकरूपता पर आधारित नहीं रही, बल्कि विभिन्न भाषाओं के बीच आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व से बनी है।

श्री राधाकृष्णन ने कहा कि प्राचीन शिलालेखों, ताड़पत्रों और हस्तलिखित ग्रंथों से लेकर आज के डिजिटल माध्यमों तक भाषाओं ने मानव विचारों को आकार दिया है और ज्ञान को संरक्षित किया है। आज आवश्यकता है कि भाषाई विविधता की रक्षा के साथ-साथ लुप्तप्राय भाषाओं को शिक्षा और तकनीक से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि हर भाषा का सम्मान करना, हर भारतीय की गरिमा का सम्मान करने जैसा है।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' अति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्याम परांडे, जापान के वरिष्ठ भाषाविद एवं पद्मश्री सम्मानित तोमियो मिज़ोकामि, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी भी मंच पर मौजूद रहे। मंच संचालन सम्मेलन के निदेशक अनिल जोशी ने किया।

इस अवसर पर डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे संस्कृति, ज्ञान, दर्शन और सामाजिक मूल्यों की संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि योग, आयुर्वेद, साहित्य और दर्शन जैसी भारत की अमूल्य धरोहरें भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही विश्व में पहुंची हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय भाषाएं संघर्ष नहीं, बल्कि समरसता, सह-अस्तित्व और सामाजिक संतुलन की शिक्षा देती हैं।

श्री रामबहादुर राय ने कहा कि भारतीय भाषाओं को लेकर जो कृत्रिम विभाजन किया गया है, वह भ्रम पर आधारित है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाएं एक ही परिवार की हैं और इनके बीच संवाद बढ़ाने की आवश्यकता है। जब भाषाओं के बीच संवाद बढ़ेगा, तो भाषाई और सांस्कृतिक एकता की तरंग स्वतः उत्पन्न होगी।

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