नयी दिल्ली , नवंबर 03 -- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को उच्चतम न्यायालय मं चुनौती दी है जिसमें तमिलनाडु के सार्वजनिक स्थानों से राजनीतिक दलों के झंडे वाले स्थायी स्तंभों को हटाने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि इस मामले को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा जाए, जिसने पहले इसी मुद्दे पर एक संबंधित मामले की सुनवाई की थी।
पीठ ने कहा कि इस मामले को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली समन्वय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और यदि आवश्यक हो, तो मुख्य न्यायाधीश से अनुमति ली जा सकती है।
पीठ ने इसके बाद मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
विशेष अनुमति याचिका में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ के 13 अगस्त के आदेश को चुनौती दी गई है।
भाकपा ने मेसर्स राम शंकर एंड कंपनी के माध्यम से दायर वर्तमान विशेष अनुमति याचिका में तर्क दिया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में खारिज किया गया मामला सीमांत था और इसलिए 'विलय के सिद्धांत' के अंतर्गत नहीं आता, जिससे उच्च न्यायालय को मामले की स्वतंत्र रूप से गुण-दोष के आधार पर जाँच करने की अनुमति मिलती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि उच्च न्यायालय के आदेश अनुच्छेद 19(1)(क) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) तथा 19(1)(ग) (संघ बनाने की स्वतंत्रता) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और राजनीतिक दलों को सुने बिना ही आदेश पारित कर दिया जाना असंवैधानिक है।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2024 में मदुरै खंडपीठ ने सार्वजनिक क्षेत्रों से राजनीतिक झंडो वाले स्तंभों को हटाने के एकल-न्यायाधीश के आदेश की पुष्टि की थी। फिर उच्चतम न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2024 में एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए यह याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय की एक अन्य खंडपीठ ने जून 2024 में इसी तरह की एक अपील पर सुनवाई करते हुए पिछले फैसले पर अपनी आपत्तियाँ व्यक्त की थीं। जिसके बाद मामले को एक पूर्ण पीठ के पास भेज दिया गया। इस पूर्ण पीठ ने अगस्त में ही आदेश दिया कि आगे कोई निर्णय आवश्यक नहीं है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने पहले ही खंडपीठ के पिछले आदेश को बरकरार रखा था।
मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति जी.के. इलांथिरायन द्वारा दिए गए मूल आदेश में सभी राजनीतिक दलों और संगठनों को सार्वजनिक भूमि, राजमार्गों और सरकारी संपत्ति पर लगे झंडे वाले स्थायी स्तंभों को 12 सप्ताह के भीतर हटाने का निर्देश दिया गया था। इस समय सीमा के भीतर उन स्तंभों को नहीं हटाने पर अधिकारी उन्हें हटा सकते थे और संबंधित पक्षों से लागत वसूल सकते थे।
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