बैतूल , दिसंबर 5 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की पारंपरिक भरेवा धातु शिल्पकला को भारत सरकार ने भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) प्रदान कर दिया है। चेन्नई स्थित बौद्धिक संपदा अधिकार (जीआई रजिस्ट्री) द्वारा मिले इस सम्मान ने न केवल इसकी मौलिकता को संरक्षित किया है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का मार्ग भी प्रशस्त किया है।
भरेवा धातु शिल्पकला बैतूल की सदियों पुरानी परंपरा है, जिसमें पंचधातु तांबा, जस्ता, सीसा, टिन और चांदी को पिघलाकर अनोखी कलाकृतियां बनाई जाती हैं। बारीक डिजाइन, मजबूत संरचना और आकर्षक स्वरूप इसकी मुख्य विशेषताएं हैं। 'मोरचिमनी' इस कला की सबसे लोकप्रिय कलाकृति मानी जाती है, जो बैतूल और मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
इस कला को राष्ट्रीय पहचान तब और मजबूत मिली जब हाल ही में प्रदेश की यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भरेवा कला से बनी विशेष मोर की कलाकृति भेंट की थी। प्रधानमंत्री को भेंट की गई इस कलाकृति ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा बटोरी और इसी के बाद जीआई टैग के लिए प्रयासों ने गति पकड़ ली। विशेषज्ञों के अनुसार, यह भेंट भरेवा कला के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुई।
जीआई टैग मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि भरेवा धातु शिल्पकला विशुद्ध रूप से बैतूल की विरासत है। अब इसकी नकल किसी अन्य क्षेत्र में आधिकारिक रूप से नहीं की जा सकेगी। इससे जुड़े कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचने के अधिक अवसर मिलेंगे। साथ ही सरकार तथा विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से प्रशिक्षण, विपणन और निर्यात संबंधी सुविधाओं को भी बढ़ावा मिलेगा।
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