पटना , फरवरी 06 -- बिहार के संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने शुक्रवार को विधानसभा में कहा कि सरकार को प्रदेश में आम आदमी के स्वास्थ्य की चिंता है और वर्तमान में राज्य अपने कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 1.5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च कर रहा है, जो पडोसी राज्यों बंगाल और झारखंड से ज्यादा है।
विधायक आईपी गुप्ता के अल्पसूचित प्रश्न पर सरकार की ओर से दिए जा रहे हैं जवाब के दौरान हस्तक्षेप करते हुए श्री चौधरी ने कहा कि राज्य सरकार स्वास्थ्य पर कुल जीएसडीपी का 1.5 प्रतिशत खर्च कर रही है, जो झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित पड़ोसी राज्यों से अधिक है।
श्री गुप्ता ने प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय और इससे जुड़े अन्य मुद्दों पर सरकार से जानकारी मांगी थी, जिस पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से मंत्री प्रमोद कुमार सदन में उत्तर दे रहे थे।
श्री गुप्ता ने कहा कि वर्ष 2024 में प्रकाशित राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2023 के अनुसार बिहार सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं पर प्रति व्यक्ति औसतन केवल 701 रुपये वार्षिक खर्च करती है, जो देश के सभी राज्यों में सबसे कम है। उन्होंने कहा कि इसकी तुलना में, पड़ोसी राज्य झारखंड में प्रति व्यक्ति 1,014 रुपये और पश्चिम बंगाल में 1,346 रुपये खर्च किए जाते हैं। उन्होंने स्वास्थ्य पर औसत प्रति व्यक्ति व्यय बढ़ाने के लिए सरकार के उठाए जा रहे कदमों का विवरण देने की मांग की।
श्री चौधरी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि बिहार सरकार राज्य के हर हिस्से में सभी मानकों पर बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के कारण शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) दोनों में कमी आई है। उन्होंने बताया कि पहले शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 40 थी, जो अब घटकर 22 से 23 के बीच रह गई है।
इससे पहले मंत्री प्रमोद कुमार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि राज्य में स्वास्थ्य पर होने वाला व्यय 1919-20 के मुकाबले तीन गुना बढ़ा है। उन्होंने राज्य भर में इस क्षेत्र में किए गए विभिन्न बुनियादी ढांचागत विकास कार्यों की भी जानकारी दी।
मंत्री के उत्तर से असंतुष्ट श्री गुप्ता ने कहा कि उन्होंने राज्य में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय की जानकारी मांगी थी। उन्होंने कहा कि उचित स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में डॉक्टर लोगों को शहरों में रेफर कर देते हैं और मरीज निजी अस्पतालों के जाल में फंसने को मजबूर हो जाता है।
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