लखनऊ , नवंबर 17 -- बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की ऐतिहासिक जीत का राजनीतिक असर अब उत्तर प्रदेश में भी महसूस किया जाने लगा है। दोनों राज्यों की जातिगत संरचना में समानताओं के चलते यह जीत प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर सकती है।
भाजपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि बिहार में गैर-यादव पिछड़ों (ओबीसी), अति पिछड़ों के राजग के साथ एकजुट होने से उत्तर प्रदेश में भी गठबंधन के मनोबल को बढ़त मिलेगी। हालांकि उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबला अभी डेढ़ वर्ष दूर है, लेकिन बिहार के नतीजों की गूंज सबसे पहले पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के आगामी चुनावों में सुनाई देगी।
बिहार के नतीजों पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विपक्ष की हार के लिए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को जिम्मेदार ठहराया था । उन्होंने दावा किया कि एसआईआर के जरिए सियासी साजिश की गई, लेकिन चेतावनी दी कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और यूपी में अब यह "चाल" सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी पीपीटीवी मॉडल के जरिये भाजपा की "साजिशों पर नजर रखेगी"।
इस बीच राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार के नतीजों से यूपी की जमीन पर कोई बड़ा बदलाव भले न दिखे, पर भाजपा की उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं। खासकर तब जब 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की सीटें 64 से घटकर 36 हुई थीं।
कुछ विश्लेषक यह भी कहते हैं कि बिहार के नतीजे अखिलेश यादव को कांग्रेस के साथ गठबंधन पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञ के मुताबिक दोनों राज्यों में नेतृत्वकारी चेहरों बिहार के नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता राजग को मजबूत आधार देती है। नीतीश कुमार की 'सुशासन बाबू' छवि और महिलाओं में उनकी पकड़ को योगी आदित्यनाथ की सख्त कानून-व्यवस्था वाली छवि के समान माना जा रहा है। 2022 के यूपी चुनाव में भी योगी सरकार पर एंटी-इन्कम्बेंसी का असर नहीं दिखा था।
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि, " बिहार चुनाव ने यह भी संकेत दिया कि बेहतर तालमेल और गठबंधन की मजबूती भाजपा, जेडीयू, एलजेपी (राम विलास) और आरएलएम कैसे भारी बहुमत दिला सकती है। इसी तर्ज पर यूपी में राजग के घटक भाजपा, अपना दल (एस), रालोद, निषाद पार्टी और सुभासपा यदि 2027 में संयुक्त रणनीति के साथ उतरते हैं, तो इसका उन्हें भारी लाभ मिल सकता है।"दूसरी ओर, विपक्षी खेमे में चिंता की लकीरें गहरी हैं। अगर अखिलेश यूपी चुनाव में कांग्रेस का साथ छोड़ते हैं तो अल्पसंख्यक मतों में आंशिक बिखराव का खतरा पैदा होगा। हालाकि इसकी संभावना नहीं के बराबर है क्योंकि उन्होंने कहा है कि वह कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ेंगे।
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