नयी दिल्ली , नवंबर 03 -- कांग्रेस ने कहा है कि बिहार को भाजपा-जद-यू के शासन ने दो दशक में बर्बाद कर औद्योगिक नक्शे से उसे लगभग मिटा दिया है। इसके कारण प्रतिभाओं ने पलायन किया है लेकिन अब बिहार को बचाने तथा इसके पुनर्निर्माण की जरूरत है।
कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने सोमवार को एक बयान में कहा कि कभी चीनी, पेपर, जूट, सिल्क और डेयरी के लिए जाना जाने वाला बिहार आज बेरोज़गारी और पलायन का पर्याय बन गया है। भाजपा-जेडीयू ने 20 वर्षों के शासन में असीम औद्योगिक संभावनाओं वाले बिहार में सिर्फ़ पलायन उद्योग स्थापित किया है और बिहार को विकास और उद्योग के राष्ट्रीय नक्शे से लगभग मिटा दिया है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा बिहार के हित के लिए काम किया है और आजादी के बाद अविभाजित बिहार में पार्टी की सरकारों ने अनेक औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित कीं, जिनकी वजह से यह राज्य देश के औद्योगिक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित हुआ। उस दौर में भारी उद्योग, ऊर्जा, डेयरी और रेल उत्पादन आदि में बिहार में विकास का पहिया तेजी से घूम रहा था। कांग्रेस शासन में स्थापित प्रमुख औद्योगिक इकाइयों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बरौनी तेल शोधन कारखाने ने बिहार को ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाया था जबकि सिंदरी और बरौनी खाद कारखाना केवल बिहार ही नहीं देश की खाद सुरक्षा में मददगार बना। इसी तरह से बरौनी डेयरी और आज की सुधा डेयरी की नींव रखी और बेला में रेल पहिया कारखाना खोला। मढ़ौरा में डीज़ल लोकोमोटिव कारखाना, नवीनगर थर्मल प्रोजेक्ट और सुधा कोऑपरेटिव डेयरी नेटवर्क की स्थापना कांग्रेस की सरकारों ने की है।
श्री रमेश ने बिहार में बंद हुए कारखानों का जिक्र करते हुए कहा कि एक तरफ कांग्रेस सरकारों ने विजन के साथ बिहार में औद्योगिक विकास की बुनियाद खड़ी की तो वहीं भाजपा-जदयू की सरकार ने कोई महत्वपूर्ण उद्योग स्थापित करने की बजाय पुराने उद्योगों को खंडहर में तब्दी कर दिया।
राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार फैलाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भ्रष्ट और अव्यवस्थित नीतियों से इस सरकार ने मौजूद उद्योगों को भी चौपट कर दिया। अशोक पेपर मिल की 400 एकड़ जमीन का परिसर खंडहर बन चुका है। मशीनें सड़ गईं हैं और मजदूर उजड़ गए हैं। कभी बिहार में 33 से अधिक चीनी मिलें थीं, जिनकी देश के कुल चीनी उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी थी लेकिन आज उनमें से अधिकांश बंद पड़ी हैं और सकरी, रैयम, लोहट, मोतीपुर, बनमनखी, मोतिहारी की मशीनें ट्रकों में भरकर कबाड़ में बेच दी गईं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर चुनाव में इन्हें पुनः चालू कराने का वादा करते हैं लेकिन उनके हर वादे के बाद एक के बाद एक चीनी मिल बंद होती गई।
उन्होंने कहा कि यही हाल जूट उद्योग का भी हुआ। समस्तीपुर की रामेश्वर जूट मिल 2017 से बंद है जबकि भागलपुर का प्रसिद्ध सिल्क उद्योग दम तोड़ रहा है। स्पन सिल्क फैक्ट्री वर्षों से बंद है और 95 फीसद बुनकर परिवार कर्ज और गरीबी में डूबे हैं। सरकार के हालात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि बड़ा उद्योग तो समुद्र किनारे लगता है। केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि बिहार में उद्योग के लिए ज़मीन नहीं लेकिन प्रधानमंत्री के चहेते उद्योगपतियों को एक रुपये प्रति एकड़ ज़मीन दी जाती है। आज तीन करोड़ से अधिक लोग रोज़गार के लिए बिहार छोड़ चुके हैं। बिहार के कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, अररिया जैसे सीमावर्ती इलाकों से मजदूर पश्चिम बंगाल और असम में जाकर दिहाड़ी कर रहे हैं।
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