चंडीगढ़ , मार्च 10 -- केंद्र सरकार द्वारा निजीकरण को बढ़ावा देने के विरोध में मंगलवार को पंजाब सहित पूरे देश में व्यापक प्रदर्शन किए गए।
ऑल इंडिया पॉवर इम्पलाई फैडरेशन (एआईपीईएफ) के मीडिया सलाहकार वी.के. गुप्ता ने बताया कि जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात, असम और अन्य राज्यों के प्रमुख शहरों में बिजली क्षेत्र के इंजीनियरों और कर्मचारियों द्वारा विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए। उन्होने बताया कि सभी जगहों पर वक्ता सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम ) के वित्तीय रूप से कमजोर होने, किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरें बढ़ने, मुनाफे के निजीकरण और घाटे के समाजीकरण, तथा सस्ती और सार्वभौमिक बिजली की पहुंच पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंतित थे। उन्होंने 'विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025' को तत्काल वापस लेने, क्रॉस-सब्सिडी (अतिरिक्त सब्सिडी) के संरक्षण और किसानों व घरेलू उपभोक्ताओं के लिए सस्ती बिजली सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने मांग की कि किसी भी सुधार को लागू करने से पहले बिजली कर्मचारियों, इंजीनियरों, किसानों और उपभोक्ता संगठनों के साथ सार्थक परामर्श किया जाए।
एआईपीईएफ के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे ने कहा कि प्रस्तावित 'विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025' किसानों, उपभोक्ताओं, बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों और देश के संघीय ढांचे के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। यह विधेयक मुख्य रूप से बिजली वितरण के निजीकरण को बढ़ावा देता है, बिजली क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा को कमजोर करता है और निर्णय लेने की शक्तियों का केंद्रीकरण करता है।
एआईपीईएफ के सुनील ग्रोवर ने कहा कि पांच साल के भीतर क्रॉस-सब्सिडी खत्म करने से कृषि उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरों में भारी वृद्धि होगी। निजी वितरण कंपनियों द्वारा ग्रामीण और कम राजस्व वाले कृषि क्षेत्रों को सेवा देने की संभावना कम है, जिससे गाँवों में बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति प्रभावित होगी। बिजली की दरें बढ़ने से कृषि उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका अंतिम असर खाद्य कीमतों पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि एक ही क्षेत्र में कई वितरण लाइसेंसधारियों को अनुमति देने का परिणाम यह होगा कि निजी कंपनियां केवल अधिक भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को चुनेंगी, जिससे सार्वजनिक डिस्कॉम्स के पास केवल घाटे वाले उपभोक्ता रह जाएंगे। वितरण का यह 'बैकडोर निजीकरण' बिजली क्षेत्र के हजारों कर्मचारियों और इंजीनियरों के लिए नौकरी की असुरक्षा पैदा करेगा। क्रॉस-सब्सिडी के धीरे-धीरे खत्म होने से घरेलू उपभोक्ताओं, विशेषकर कम आय वाले परिवारों के लिए बिजली की दरों में काफी वृद्धि होगी। बिजली सेवा-उन्मुख के बजाय बाजार-संचालित हो सकती है, जिससे सार्वभौमिक पहुंच कमजोर होगी।
उन्होंने कहा कि संविधान के तहत बिजली 'समवर्ती सूची' का विषय है, लेकिन यह विधेयक राज्य की बिजली नीतियों पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को बढ़ाता है। एक नए केंद्रीय निकाय 'राष्ट्रीय विद्युत परिषद' का गठन और नियम बनाने की व्यापक शक्तियाँ राज्य सरकारों की स्वायत्तता को कम कर देंगी। राज्य अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुसार टैरिफ, सब्सिडी और वितरण नीतियां निर्धारित करने में लचीलापन खो सकते हैं। बिजली को एक ऐसी सार्वजनिक सेवा बने रहना चाहिए जो सभी नागरिकों के लिए सस्ती और विश्वसनीय बिजली सुनिश्चित करे। यह आशंका जताई गई थी कि सरकार 10 मार्च 2026 को संसद में 'विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025' पेश कर सकती है, लेकिन नवीनतम उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह विधेयक अभी संसद के वर्तमान सत्र के सूचीबद्ध कार्यसूची में शामिल नहीं किया गया है।
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