भुवनेश्वर , जनवरी 13 -- उड़ीसा उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई लड़की शादी के लिए तैयार नहीं है, तो बाहरी दबाव या जबरदस्ती के जरिए उसकी शादी कराना स्वस्थ समाज के अनुकूल नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति मुराहारी श्री रमन की पीठ ने कहा, "अब वह समय आ गया है जब समाज को आत्ममंथन करना चाहिए कि लड़कियों को उनके माता-पिता द्वारा जबरन शादी के लिए मजबूर करते हैं तो क्या होता है। लड़की का निर्णय सर्वोपरि है और माता-पिता को कोई भी फैसला लेने से पहले उसकी सहमति लेनी चाहिए।"न्यायालय ने यह टिप्पणी एक विवाहित महिला की उस याचिका का निपटारा करते हुए की, जिसमें उसने जबरन कराई गई शादी के बाद अलग रहने की अनुमति मांगी थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में माता-पिता को ऐसा निर्णय लेने से पहले बालिग लड़की की सहमति अवश्य लेनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान काकटपुर पुलिस उक्त महिला को अदालत में पेश कर लाई। महिला ने बताया कि जबरन विवाह के कारण उसे ससुराल में रहने में कठिनाई हो रही थी, जिसके चलते वह अपनी मर्जी से वहां से चली गई। उसने साफ कहा कि वह न तो अपने पति के साथ रहना चाहती है और न ही अपने माता-पिता के साथ, क्योंकि वह रोज़गार में है और स्वयं अपनी आजीविका अर्जित करती है।
अदालत ने कहा कि महिला बालिग है और अपने फैसले स्वयं लेने में सक्षम है।
पीठ ने पुलिस को निर्देश दिया कि महिला को उसके इच्छित स्थान पर सुरक्षित और सुचारु रूप से लौटने में सहायता की जाए और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि उसके माता-पिता या तथाकथित पति सहित किसी भी पक्ष की ओर से कोई हस्तक्षेप या बाधा न उत्पन्न हो।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, "जब कोई लड़की शादी के लिए तैयार नहीं होती, तब बाहरी दबाव का इस्तेमाल कर उसकी शादी कराना स्वस्थ समाज के लिए उचित नहीं है। अब समय आ गया है कि प्रशासन द्वारा संवेदनशील कार्यक्रम चलाए जाएं, ताकि माता-पिता बच्चों पर अपने निर्णय थोपने की मानसिकता से बाहर निकलें। हम एक बालिग लड़की के फैसले का सम्मान करते हैं।"उच्च न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि पुलिस महिला की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करे और यदि किसी प्रकार की घटना की सूचना मिलती है, तो तत्काल आवश्यक कदम उठाए।
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