बारां , दिसम्बर 17 -- राजस्थान में एक शिक्षक का जीवन समाज को दिशा देने में बीतता है, लेकिन मृत्यु के बाद अपनी देह को समाज के हित में सौंप देना एक ऐसा 'महादान' है जो बहुत ही कम लोग कर पाते हैं।
बूंदी जिले के एक छोटे से गांव अड़ीला के निवासी और शिक्षाविद छोटूलाल बाथरा ने अपनी मृत्यु को भी 'जीवनदान' में बदल दिया। उनके पार्थिव शरीर के दान से बारां मेडिकल कॉलेज के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। कॉलेज को अपनी स्थापना के बाद पहली बार एनाटॉमी (शरीर रचना विज्ञान) की पढ़ाई के लिए 'कैडेवर' (पार्थिव देह) प्राप्त हुई है।
अड़ीला गांव के त्रिमूर्ति बाल उच्च माध्यमिक विद्यालय के संस्थापक छोटूलाल बाथरा का मंगलवार शाम कोटा में आकस्मिक निधन हो गया था। उनके निधन के बाद शोकाकुल परिवार ने विलाप करने के बजाय उनकी अंतिम इच्छा को सर्वोपरि रखा। कापरेन शाखा के संरक्षक एवं ग्राम विकास परियोजना के पूर्व राष्ट्रीय सचिव ललित कुमार टेलर ने बुधवार को बताया कि वर्ष 2021 में भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित नेत्रदान-देहदान कार्यशाला में शाइन इंडिया फाउंडेशन के कार्यों से प्रभावित होकर बाथरा ने देहदान का संकल्प पत्र भरा था। उनके इस संकल्प को पूरा करने के लिए शाइन इंडिया फाउंडेशन के डॉ. कुलवंत गौड़ और कापरेन शाखा ने तत्काल मोर्चा संभाला। पहले कोटा मेडिकल कॉलेज में उनका नेत्रदान संपन्न हुआ और फिर आज उनकी देह बारां मेडिकल कॉलेज लाई गई।
दोपहर करीब एक बजे एंबुलेंस पार्थिव देह लेकर बारां मेडिकल कॉलेज पहुंची। यहाँ का माहौल किसी उत्सव और श्रद्धा के संगम जैसा था। कॉलेज के डीन, फैकल्टी और एमबीबीएस के विद्यार्थी पहले से ही कतारबद्ध खड़े थे। सभी ने बारी-बारी से पुष्प अर्पित करके उस 'महामानव' को नमन किया। जो अब उनका 'सब्जेक्ट' नहीं बल्कि 'गुरु' बनने जा रहा था।
बारां मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सी.एम. मीणा ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि वह पिछले दो वर्ष से कैडेवर के इंतजार में थे। उन्होंने कहा, आज भारत विकास परिषद और शाइन इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से हमें पहला देहदान प्राप्त हुआ है। यह दान छात्रों को होनहार डॉक्टर बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।
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