नयी दिल्ली , जनवरी 13 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कथित हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई संबंधित पक्षों से जवाब मिलने के बाद 19 जनवरी को एक साथ की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब एक वकील ने अदालत के समक्ष इस मुद्दे को उठाया तथा एक प्रतिवाद हलफनामे का हवाला दिया जिसमें कथित तौर पर राज्य में हिंसा की कम से कम छह घटनाओं को स्वीकार किया गया है।
वकील ने अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई उसी दिन दोपहर 2 बजे बिहार से संबंधित एक समान मामले के साथ की जाए।
मुख्य न्यायाधीश ने हालांकि यह अनुरोध अस्वीकार कर दिया और कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल के पहले उल्लेखित संबंधित याचिका पर पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका है और केंद्र तथा अन्य पक्षों को शुक्रवार तक अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "हमने कल उल्लेखित एक संबंधित मामले में पहले ही नोटिस जारी कर दिया है। जवाब दाखिल करने के लिए शुक्रवार तक का समय दिया गया है। इस पर सोमवार को सुनवाई होगी।"पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि मंगलवार को उल्लिखित याचिका को पश्चिम बंगाल से संबंधित अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ा जा सकता है और अगले सप्ताह उन पर एक साथ सुनवाई की जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "पश्चिम बंगाल के सभी मामलों पर सोमवार को सुनवाई होगी।"बारह जनवरी को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के संचालन के तरीके पर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया था कि "अत्यंत विचित्र प्रक्रियाएं" अपनाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर व्हाट्सएप के माध्यम से संचार किया जा रहा था और दावा किया कि इस प्रक्रिया में "तर्कहीन विसंगतियां" है।
इससे पहले, पिछले साल दिसंबर में, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने शीर्ष न्यायालय को बताया था कि एसआईआर के दौरान पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप "अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर" पेश किए गए है और "निहित राजनीतिक हितों" से प्रेरित थे।
तृणमूल कांग्रेस सांसद डोला सेन की ओर से पेश जनहित याचिका के जवाब में दायर एक प्रति-हलफनामे में, ईसीआई ने अपने 24 जून और 27 अक्टूबर के एसआईआर आदेशों का बचाव करते हुए कहा कि वे संवैधानिक रूप से वैध थे और मतदाता सूचियों की सटीकता बनाए रखने के लिए आवश्यक थे।
आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों का हवाला देते हुए इस प्रकार के पुनरीक्षण करने के अपने अधिकार को उचित ठहराया।आयोग ने यह भी कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण 1950 के दशक से ही भारत की चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं और अपने इस रुख के समर्थन में अतीत में हुए कई राष्ट्रव्यापी पुनरीक्षणों का उदाहरण दिया। आयोग ने इस दावे को खारिज कर दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण से वास्तविक मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जाएगा और इस बात पर जोर दिया कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी भी मतदाता का नाम हटाया नहीं जा सकता।
चुनाव आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में मौजूदा मतदाताओं में से 99.77 प्रतिशत को पहले से भरे हुए जनगणना प्रपत्र दिए जा चुके हैं, और 70 प्रतिशत से अधिक भरे हुए प्रपत्र प्राप्त हो चुके हैं।
आयोग ने कहा कि ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सामूहिक मताधिकार से वंचित किए जाने के दावे निराधार हैं। हलफनामे में बुजुर्गों, दिव्यांगजनों और अन्य कमजोर समूहों के लिए सुरक्षा उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है, और कहा गया है कि बूथ स्तर के अधिकारियों को बार-बार दौरा करना आवश्यक है और वे मतदाताओं से दस्तावेज एकत्र नहीं कर सकते।
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