जयंत राय चौधरी सेनयी दिल्ली , दिसंबर 04 -- रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रणनीतिक और वाणिज्यिक समझौतों के लिए भारत यात्रा पर पहुंचे हैं, लेकिन उनकी इस यात्रा को लेकर भारत का दृष्टिकोण इन समझौतों से कहीं अलग और स्पष्ट है, जो मात्र औपचारिक कुटनीति से कहीं अधिक तेजी से खंडित होती वैश्विक व्यवस्था को बचाने से जुड़ा है।

भारत के लिए रूस तीन मोर्चों पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। यह वैश्विक स्तर पर टैरिफ की अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करने में मदद करता है, कच्चे तेल का एक विश्वसनीय स्रोत है, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि भारत के पड़ोसी चीन को साधने में भूराजनैतिक कवच का काम करता है।

श्री पुतिन की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब बाइडेन प्रशासन रूस और यूक्रेन के साथ अपनी बातचीत कर रहा है और यूरोप एक भयावह युद्ध से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है। यदि ये वार्ताएं सफल होती हैं और यूक्रेन को थका देने वाला यह असमान युद्ध समाप्त हो जाता है, तो संभव है कि अमेरिका और रूस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का एक नया दौर दुनिया के सामने आये।

यह ध्यान देने योग्य है कि यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले भारत अपनी जरूरतों का केवल 2.5 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आयात करता है। लेकिन, प्रतिबंधों और यूरोपीय बाजारों द्वारा रूस के बहिष्कार के बाद भारत अपनी जरूरतों का लगभग 35 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आयात करने लगा है। इस प्रकार भारत की उर्जा रणनीति में भी व्यापक परिवर्तन हुआ है।

यदि ट्रंप प्रशासन के जोर पर शांति वार्ता सफल हो जाती है, तो भारत रूस के साथ एक ऐसे संबंध की उम्मीद कर सकता है, जो अमेरिकी आशंका से बाधित न हो, जैसा कि पिछले दिनों हुआ जब ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल आयात करने के लिए भारत पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया।

यदि, शांति वार्ता के परिणामस्वरूप, किसी स्तर पर विश्व में अमेरिका-भारत-रूस के हित आपस में जुड़ते हुए दिखते हैं तो भारत वैश्विक कूटनीति में एक मजबूत स्थिति में नजर आयेगा या एक दुर्लभ 'स्वीट स्पॉट' में होगा। लेकिन ये ऐसा है, जैसे सभी ग्रह-नक्षत्रों का भारत के पक्ष में हो जाना।

रूस-अमेरिका तनाव में कमी का मतलब यह भी होगा कि भारत को मिल रही तेल की भारी छूटें समाप्त हो जाएंगी। लेकिन भारत और रूस के पिछले 75 वर्षों के मजबूत संबंधों को देखते हुए भारत रूस का एक महत्वपूर्ण सहयोगी बना रहेगा। रूस जैसे भारत को एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप देखता है, जिस पर वह विश्वास के निर्भर हो सकता है; भारत भी रूस को अनिश्चित अमेरिकी राजनीति और चीन से उत्पन्न खतरे से बचाव के रूप में देखता है।

इस शिखर सम्मेलन में नए रक्षा उपकरणों, उनके संयुक्त उत्पादन और संयुक्त अनुसंधान से संबंधित समझौते होने की संभावना है, जो भारत की रक्षा क्षेत्र को प्रभावित करेगा। इन साझेदारियों से भारत के रक्षा क्षेत्र में रूस के लिए एक मजबूत स्थान सुनिश्चित होगा।

हालांकि, आज रूस चीन के साथ अपनी साझेदारी को उसी उत्साह से 'नो लिमिट्स पार्टनरशिप' कहता है, जिस उत्साह से वह भारत के साथ अपने रिश्ते को 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' कहता है। निश्चित रूप से यह एक अलंकारिक दोहराव है जो यूरोपीय संघ के साथ रूस के विषैले संबंधों के बिल्कुल विपरीत है, लेकिन साथ ही यह एक तथ्य है जो भारत को परेशान कर सकता है और शायद करता भी है।

क्या चीन और पाकिस्तान (बीजिंग के माध्यम से) को भी वही तकनीकें मिलेंगी जो रूस भारत को बेचता है? यह एक ऐसा सवाल है जो भारत को परेशान कर रहा है, भले ही वह इसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त न करना चाहे। फिर भी, यह समझना होगा कि रूस का चीन को गले लगाना कई मायनों में उस पश्चिमी अतिक्रमण के प्रति एक प्रतिक्रिया है जिसे रूस यूक्रेन में देखता है, क्योंकि वह यूक्रेन को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है।

रूस के लिए, यूक्रेन सिर्फ एक पड़ोसी नहीं है बल्कि रूसी पहचान और रणनीतिक गहराई का एक आधारशिला है। यूरोप के बड़े हिस्से, विशेष रूप से जर्मनी के लिए यूक्रेन एक संप्रभु राज्य है और अपनी राजनीतिक दिशा चुनने का हकदार है।

यूरोपीय देश नॉर्डिक-बाल्टिक क्षेत्र और मध्य यूरोप में रूस के इरादों को लेकर चिंतित हैं। इनके लिए यूक्रेन का समर्थन करना एक नैतिक प्रतिबद्धता और एक रणनीतिक उपकरण दोनों बन गया है, यूक्रेन की सहायता करने से रूस अपना ध्यान पूर्व में केंद्रित करने को मजबूर है, जिससे यूरोप की अपनी सीमाओं पर दबाव की संभावना कम हो जाती है।

इस प्रकार, यूक्रेन को दी जाने वाली यूरोपीय सहायता केवल एकजुटता नहीं है बल्कि नियंत्रण और संतुलन का एक तरीका भी है। उस नियंत्रण को तोड़ने के लिए रूस चीन के साथ चला गया है। हालांकि, यदि यूक्रेन युद्ध पर वास्तव में शांति की बातचीत होती है तो यह बदल सकता है।

आखिरकार, अमेरिकी और भारत दोनों वैश्विक 'युद्धक्षेत्र' को अलग तरह से देखते हैं। उनका दीर्घकालिक रणनीतिक क्षितिज एशिया में निहित है, जहाँ चीन का उदय इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बदल रहा है।

सवाल अब यह नहीं है कि रूस को कैसे नियंत्रित किया जाए, बल्कि यह है कि रूस को चीन पर पूरी तरह से निर्भर होने से कैसे रोका जाए। 2022 से, रूस की चीन पर आर्थिक और सैन्य निर्भरता गहरी हुई है। लेकिन उनकी रणनीतियों में अभी भी स्थिरता नहीं है।

भारत का रूस और अमेरिका के साथ एक समन्वित जुड़ाव चीन को इस परिदृश्य से बाहर निकाल सकता है।

अंत में, रूस के अगले कदम इसपर टिके होंगे कि क्या उसकी दीर्घकालिक सुरक्षा संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के साथ नए सिरे से संबंधों के माध्यम से चीन को संतुलित करने में है, या चीन के साथ एक साझेदारी को दोगुना करने में है जिससे अल्पकालिक राहत, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान संभव है।

भारत, अपनी ओर से, यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मास्को जो भी चुनाव करे, वह उसमें केंद्रीय भूमिका में रहे।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित