नयी दिल्ली , जनवरी 07 -- उच्चतम न्यायालय ने 2024 पुणे पॉर्श मामले में आरोपी व्यवसायी आशीष मित्तल और आदित्य सूद की ओर से दायर की गयी ज़मानत याचिकाओं पर बुधवार को नोटिस जारी किये। यह मामला एक बिना पंजीकरण वाली पोर्श टायकन से जुड़ा है, जिसे कथित तौर पर शराब के नशे में एक नाबालिग चला रहा था। नाबालिग ने पुणे के कल्याणी नगर इलाके में दो बाइक सवारों को टक्कर मार दी थी और दोनों की बाद में मौत हो गयी थी।

न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और उज्ज्वल भुयान की पीठ ने मित्तल और सूद द्वारा दायर याचिकाओं पर जवाब मांगा। इससे पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इनके जमानत आवेदनों को खारिज कर दिया था।

दोनों व्यवसायियों पर आरोप है कि उन्होंने अपने खून के नमूनों को गाड़ी में मौजूद दो नाबालिगों के नमूनों से बदल दिया था, जो कथित तौर पर घटना के समय शराब के नशे में थे। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि सबूत गढ़ने और नाबालिग आरोपी को बचाने के लिए यह हेरफेर किया गया था। मित्तल और सूद पर भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत जालसाजी, सबूतों से छेड़छाड़ और रिश्वतखोरी सहित कई अपराधों के लिए मामला दर्ज किया गया है।

उल्लेखनीय है कि 16 दिसंबर, 2025 को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मामले में आठ आरोपियों की ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। न्यायमूर्ति श्याम चंदक की एकल-पीठ ने विशाल अग्रवाल (कथित नाबालिग ड्राइवर के पिता), आशीष मित्तल, आदित्य सूद, अरुणकुमार सिंह, अशपाक मकंदर, अमर गायकवाड़, डॉ. अजय तवारे और डॉ. श्रीहरि हलनोर की याचिकाएं खारिज की थीं।

उस समय फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ तवारे और मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. श्रीहरि हलनोर पर नाबालिग आरोपी के खून के सैंपल बदलने में मदद करने का आरोप था। अशपाक मकंदर और अमर गायकवाड़ पर बिचौलिए होने का आरोप था, जिन्होंने सैंपल बदलने के मकसद से विशाल अग्रवाल को डॉक्टरों से मिलवाया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सूद ने कथित तौर पर अपने नाबालिग पुत्र के नमूने को बदलने के लिए अपने खून का नमूना दिया था, जबकि मित्तल ने कथित तौर पर अपने खून के नमूने को अरुणकुमार सिंह के पुत्र के नमूने से बदल दिया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से छेड़छाड़ करने और दुर्घटना के समय गाड़ी चला रहे नाबालिग को बचाने के लिए झूठे सबूत बनाने की आपराधिक साज़िश का एक मज़बूत प्रथम दृष्टया मामला बनता है।उच्च न्यायालय ने कहा कि कथित तौर पर यह दिखाने के लिए झूठे मेडिकल प्रमाण-प्रत्र बनाये गये थे कि कानून के साथ संघर्ष करने वाला नाबालिग और उसके दोस्त शराब के नशे में नहीं थे। साथ ही मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) रजिस्टर में झूठी जानकारी भरी गयी और खून के नमूने पर गलत जानकारी वाले गलत लेबल लगाये गये। न्यायालय ने कहा कि ये काम कथित तौर पर रिश्वत की रकम के बदले में किये गये थे, जिसका मकसद नाबालिग को आईपीसी की धारा 304 के तहत गैर इरादतन हत्या सहित अपराधों के लिए अभियोजन से बचाना था।

आरोपियों ने न्यायालय के सामने दलील दी थी कि वे दुर्घटना में शामिल नहीं थे और उनके खिलाफ कोई मज़बूत आपत्तिजनक सबूत नहीं है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया, यह दावा करते हुए कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं दिये गये थे।

राज्य ने ज़मानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि महत्वपूर्ण सबूत, यानी नाबालिग आरोपी के खून के सैंपल के साथ छेड़छाड़ की गयी थी और प्रमुख गवाहों को डराया-धमकाया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने ज़मानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि सबूत आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल आधार हैं और आरोपियों ने सामूहिक रूप से उस प्रक्रिया को कमज़ोर करने की कोशिश की थी। जमानत याचिका खारिज होने के बाद मित्तल और सूद अब उच्चतम न्यायालय गये हैं। उच्चतम न्यायालय ने नोटिस जारी किया है और जवाब दाखिल होने के बाद इस मामले पर विचार करेगा।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित