नैनीताल , जनवरी 14 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरकारी विभागों में पद खाली होने के बावजूद नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू न करने और तदर्थ नियुक्तियों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है और याचिका का दायरा बढ़ाते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि एक तरफ प्रदेश का युवा सरकारी नौकरियों के इंतजार में 'ओवर एज' हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार नियमित पदों को भरने के बजाय आउटसोर्स और अस्थायी माध्यमों से काम चला रही है।

न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने कमेटी ऑफ जनता मैनेजमेंट जनता इंटर कालेज चैल, चैनपुर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किया। इस मामले में विगत 09 जनवरी को सुनवाई हुई लेकिन आदेश की प्रति बुधवार को मिली।

अदालत ने अपने आदेश में इस प्रथा को पूरी तरह से 'शोषणकारी' और 'तर्कहीन' करार दिया है। पीठ ने टिप्पणी की कि स्वीकृत और रिक्त पदों पर ठेके या आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्तियां करना न केवल युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। अदालत ने इसे राज्य सरकार की उदासीनता और निष्क्रियता करार दिया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने चतुर्थ श्रेणी पदों को 'डाइंग कैडर' (मृत संवर्ग) घोषित किए जाने पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने संज्ञान लिया कि उत्तर प्रदेश की जिस नीति को आधार बनाकर उत्तराखंड में इन पदों को खत्म किया जा रहा है उसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। ऐसे में इन पदों को डाइंग कैडर घोषित करना युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों को बंद करने जैसा है।

अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे सभी विभागों से रिक्त पदों का पूरा डाटा एकत्र कर एक विस्तृत शपथ पत्र के माध्यम से अदालत में पेश करें। सरकार को यह भी बताना है कि जब पद स्वीकृत हैं तो उन पर नियमित नियुक्ति क्यों नहीं की जा रही है और क्यों इन पदों को आउटसोर्स या दैनिक वेतन भोगियों के माध्यम से भरा जा रहा है।

इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई आगामी 16 फरवरी को होगी। अदालत ने साफ संकेत दिया कि वह इस मुद्दे की गहराई तक जाएगा ताकि योग्य और पात्र युवाओं को उनका संवैधानिक हक मिल सके और प्रदेश में नियमित नियुक्तियों का रास्ता साफ हो सके।

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