चंडीगढ़ , दिसंबर 30 -- पंजाब विधान सभा ने मंगलवार को ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री तरुनप्रीत सिंह सौंद द्वारा पेश किये गये एक प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया, जिसमें केन्द्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मगनरेगा) को 'विकसित भारत- रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) के लिये गारंटी अधिनियम' नामक नये अधिनियम से बदलने के कदम की कड़ी निंदा की गयी है।

मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण विकास रोजगार गारंटी अधिनियम, भारत सरकार द्वारा सितंबर 2005 में पारित किया गया था तथा इसे 2008-09 में पंजाब के सभी जिलों में लागू किया गया था। बाद में, भारत सरकार द्वारा इस योजना का नाम दो अक्टूबर 2009 को मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) रखा गया था। मनरेगा योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक घर के वयस्क सदस्य जो गैर-हुनरमंद हाथ से कार्य करने के इच्छुक हैं, को एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों की गारंटीशुदा मजदूरी वाला रोजगार प्रदान करके आजीविका सुरक्षा में वृद्धि करना है।

श्री सौंद ने बताया कि मनरेगा भारत के सामाजिक कल्याण तथा ग्रामीण आर्थिक सुरक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण तथा विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त कानून है, जिसने ग्रामीण भारत में गरीब, भूमिहीन तथा हाशिए पर पड़े समुदायों, जिसमें अनुसूचित जाति/जनजाति व्यक्ति तथा महिलाएं शामिल हैं, के लिए रोजगार को एक कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित किया है। यह अधिनियम मांग आधारित है, जिसके तहत यदि कोई व्यक्ति मनरेगा स्कीम के अंतर्गत कार्य की मांग करता है, तो यह राज्य तथा भारत सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है कि वह उसे निर्धारित समय के अंदर कार्य प्रदान करे या बेरोजगारी भत्ता प्रदान करे। कैबिनेट मंत्री ने कहा कि विकसित भारत- रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) के लिये गारंटी अधिनियम के तहत 60ः40 के अनुपात में वेतन देने तथा साप्ताहिक भुगतान अनिवार्य करने की बात की गयी है, लेकिन वास्तव में ये बदलाव राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ कम करने की बजाय बढ़ाएंगे।

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