नयी दिल्ली , नवंबर 08 -- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को किफायती और त्वरित न्याय सुलभ कराने में कानूनी सहायता की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि कानूनी सेवा प्राधिकरण न्यायपालिका और आम नागरिक के बीच एक पुल का काम करते हैं।
प्रधानमंत्री ने शनिवार को यहां उच्चतम न्यायालय में "कानूनी सहायता तंत्र की मजबूती " से सम्बंधित राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया । उन्होंने इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों, न्यायपालिका के सदस्यों और कानूनी सेवा प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा, "जब न्याय सभी के लिए सुलभ होता है, समय पर मिलता है, और हर व्यक्ति तक पहुंचता है, चाहे उसकी सामाजिक या वित्तीय पृष्ठभूमि कुछ भी हो - तभी यह सही मायने में सामाजिक न्याय की नींव बनता है।"उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसी सुलभता सुनिश्चित करने में कानूनी सहायता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्तर से लेकर तालुका स्तर तक, कानूनी सेवा प्राधिकरण न्यायपालिका और आम नागरिक के बीच एक पुल का काम करते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि लोक अदालतों और मुकदमे से पहले के समझौतों के माध्यम से लाखों विवादों को तेज़ी से, सौहार्दपूर्ण ढंग से और कम लागत पर हल किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा शुरू की गई कानूनी सहायता बचाव वकील प्रणाली के तहत, सिर्फ तीन वर्षों में लगभग 08 लाख आपराधिक मामले सुलझाए गए हैं। इन प्रयासों से देश भर में गरीबों, पीड़ितों, वंचितों और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए न्याय आसान हुआ है।
श्री मोदी ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में सरकार ने काम काज में सुगमता और लोगों का जीवन बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है। व्यवसायों के लिए 40,000 से ज़्यादा अनावश्यक अनुपालनों को हटा दिया गया है। जन विश्वास अधिनियम के माध्यम से 3,400 से ज़्यादा कानूनी प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है और 1,500 से ज़्यादा पुराने कानूनों को रद्द कर दिया गया है। लंबे समय से चले आ रहे कानूनों की जगह अब भारतीय न्याय संहिता ने ले ली है।
प्रधानमंत्री ने दोहराया कि यह सही मायने में तभी संभव हैं जब न्याय की सुलभता भी सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा , "इसे बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और आगे भी हम इस दिशा में प्रयासों को तेज़ करेंगे।" कानूनी सेवा प्राधिकरण के 30 साल पूरे होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले तीन दशकों में प्राधिकरण ने न्यायपालिका को देश के गरीब नागरिकों से जोड़ने का काम किया है।
श्री मोदी ने प्राधिकरण के कम्युनिटी मीडिएशन ट्रेनिंग मॉड्यूल के शुभारंभ की घोषणा करते हुए कहा कि यह बातचीत और सहमति से विवादों को सुलझाने की पुरानी भारतीय परंपरा को फिर से ज़िंदा करता है। ग्राम पंचायतों से लेकर गाँव के बुज़ुर्गों तक, मीडिएशन हमेशा से भारतीय सभ्यता का हिस्सा रहा है। नया मीडिएशन एक्ट इस परंपरा को आधुनिक रूप में आगे बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया कि यह ट्रेनिंग मॉड्यूल कम्युनिटी मीडिएशन के लिए रिसोर्स तैयार करने में मदद करेगा, जिससे विवादों को सुलझाने, सद्भाव बनाए रखने और मुकदमों को कम करने में मदद मिलेगी।
त्वरित न्याय व्यवस्था में प्रौद्योगिकी की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह अब समावेश और सशक्तिकरण का माध्यम बन रही है। प्रधानमंत्री ने ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट को इसका एक बेहतरीन उदाहरण बताया और कहा कि प्रौद्योगिकी न्यायिक प्रक्रियाओं को ई-फाइलिंग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक समन सेवाओं तक, वर्चुअल सुनवाई से लेकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तक सरल बना सकती है।उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी ने सब कुछ आसान बना दिया है और न्याय तक पहुंच को आसान बनाया है। उन्होंने बताया कि ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तीसरे चरण का बजट बढ़ाकर 7,000 करोड़ रुपए से ज़्यादा कर दिया गया है ।
कानूनी जागरूकता के महत्व पर ज़ोर देते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि एक गरीब व्यक्ति तब तक न्याय नहीं पा सकता जब तक उसे अपने अधिकारों की जानकारी न हो, वह कानून को न समझे, और सिस्टम की जटिलता के डर से बाहर न निकले। उन्होंने पुष्टि की कि कमज़ोर समूहों, महिलाओं और बुज़ुर्गों के बीच कानूनी जागरूकता बढ़ाना एक प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री ने इस दिशा में कानूनी संस्थानों और न्यायपालिका द्वारा किए जा रहे लगातार प्रयासों को स्वीकार किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि युवा, खासकर कानून के छात्र, एक परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकते हैं।
श्री मोदी ने सुझाव दिया कि अगर कानून के छात्रों को गरीब और ग्रामीण समुदायों के साथ जुड़कर उनके कानूनी अधिकारों और प्रक्रियाओं को समझाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो उन्हें समाज की नब्ज़ की सीधी जानकारी मिलेगी। स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों, पंचायती राज संस्थानों और अन्य मज़बूत ज़मीनी स्तर के नेटवर्क के साथ काम करके, कानूनी ज्ञान हर घर तक पहुंचाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने कानूनी सहायता के एक और महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न्याय उसी भाषा में दिया जाना चाहिए जो समझ में आए। उन्होंने कहा कि कानून बनाते समय इस सिद्धांत पर विचार किया जाना चाहिए। जब लोग कानून को अपनी भाषा में समझते हैं, तो इससे बेहतर अनुपालन होता है और मुकदमों में कमी आती है। उन्होंने फैसलों और कानूनी दस्तावेजों को स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
श्री मोदी ने 80,000 से ज़्यादा फैसलों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की शीर्ष न्यायालय की पहल की सराहना की। उन्होंने पूरा भरोसा जताया कि यह कोशिश उच्च न्यायालय और जिला अदालतों में भी जारी रहेगी।
प्रधानमंत्री ने कानूनी पेशे और न्यायिक सेवा से जुड़े सभी लोगों से अपील की कि वे देश की न्यायिक व्यवस्था जस्टिस डिलीवरी के भविष्य के बारे में सोचें, जब देश खुद को एक विकसित राष्ट्र के तौर पर पहचानेगा। उन्होंने इस दिशा में मिलकर आगे बढ़ने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
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