दरभंगा , फरवरी 20 -- बिहार के प्रतिष्ठित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने शुक्रवार को कहा कि निराला-साहित्य की भाषा चित्रोपम भाषा है।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि-लेखक महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की जयंती की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित 'निराला की साहित्य-चेतना' विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि निराला के लेखन पर उनके अन्तर्जगत का गहरा प्रभाव है। उनकी वैचारिकी निरंतर विकसनशील है। इसी कारण वे प्रगतिवाद तक की वैचारिक यात्रा तय करते हैं। उन्होंने कहा कि निराला को केवल एक युग तक सीमित करके देखना उचित नहीं है। निराला जैसे साहित्यकार संपूर्णता में देखे जाने की मांग करते हैं।

प्रो.कुमार ने निराला सबंधित संस्मरणों के जरिए उनके विराट व्यक्तित्व, सहृदयता तथा रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने व्यक्तव्य का समापन निराला की सुप्रसिद्ध कविता 'राम की शक्तिपूजा' के पाठ से किया।

इस अवसर पर डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि निराला युग-चेतना के प्रतिनिधि कवि हैं। निराला की रचनाएं आज के यथार्थ का भी वहन करती हैं।

सह'प्राचार्य डॉ. महेश प्रसाद सिन्हा ने कहा कि निराला मौलिक रूप में क्रांतिकारी बदलाव और प्रयोगों के कवि-लेखक हैं।

विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के सह-प्राचार्य एवं विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ.आर. एन चौरसिया ने कहा कि निराला जी संस्कृत और बांग्ला के भी मर्मज्ञ पंडित थे। उनके लेखन में संस्कृत साहित्य का प्रभाव सहजता से दृष्टिगोचर हो जाता है। यह भारतीय भाषाओं की अन्तः सबंधता का दुर्लभ उदाहरण है।

मंच संचालन शोधार्थी दुर्गानंद ठाकुर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी बेबी कुमारी ने किया। संगोष्ठी में डॉ. भास्कर, शोधार्थी समीर, कंचन रजक, सुभद्रा कुमारी, अपर्णा कुमारी, बेबी कुमारी, ज्योति कुमारी, रूपक कुमार स्नेहा कुमारी ने भी अपनी बातें रखीं। मौके पर शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में स्नातकोत्तर छात्र-छात्राएं उपस्थित थी।

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