नयी दिल्ली , दिसंबर 31 -- स्वच्छ भारत मिशन- शहरी (एसबीएम-यू 2.0) और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (एमओएचयूए) की पहल से शहरी स्थानीय निकाय नारियल के छिलके और कचरे से हरित विकास की नयी कहानी लिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के आह्वान पर अमल करते हुए स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया है। अभी तक जो नारियल का छिलका शहरी कचरे की बड़ी समस्या के रूप में देखा जाता था, वही कचरा आज देश के कई शहरों में आर्थिक लाभ, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का मजबूत माध्यम बन गया है।
ज्ञातव्य है कि धार्मिक स्थलों और तटीय शहरों में नारियल की खपत सर्वाधिक होती है। ओडिशा के पुरी, उत्तर प्रदेश के वाराणसी और आंध्र प्रदेश के तिरुपति जैसे प्रमुख धार्मिक नगरों में मंदिरों से निकलने वाले नारियल कचरे के निपटान के लिये विशेष मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) स्थापित किया गया है। जहां इन नारियल के छिलकों को दूसरे कचरों से अलग कर कॉयर, कोकोपीट और जैविक खाद में बदला जा रहा है, जिससे कूड़ा भराव स्थल (लैंडफिल) पर बोझ कम हुआ है और सफाई व्यवस्था में बड़ा सुधार आया है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार शहरी गीले कचरे में नारियल के छिलकों की हिस्सेदारी तीन से पांच प्रतिशत होती है, जबकि तटीय शहरों में यह छह से आठ प्रतिशत तक पहुंच जाती है। देश में प्रतिदिन पैदा होने वाले करीब 1.6 लाख टन नगरपालिका कचरे के लिहाज से यह मात्रा काफी बड़ी है। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में नारियल उत्पादन अधिक होने के कारण वहां इस कचरे को नये अवसर के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। भुवनेश्वर का पालसुनी नारियल प्रसंस्करण संयंत्र इस बदलाव की एक मजबूत मिसाल है। यह संयंत्र प्रतिदिन 189 विक्रेताओं से 5,000 से 6,000 नारियल एकत्र करता है और उन्हें रेशा, रस्सी, कोकोपीट और जैविक खाद में बदलता है। इससे हर महीने सात से नौ लाख रुपये का राजस्व पैदा हो रहा है। इसके साथ ही स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों और सफाई मित्रों को स्थायी रोजगार और सम्मानजनक आजीविका भी प्रदान कर रहा है।
केरल के कुन्नमकुलम स्थित हरित डी-फाइबरिंग इकाई नारियल के छिलकों और गीले कचरे को गंधहीन जैविक खाद में बदल रहा है। किसान अब अपने छिलके फेंकने के बजाय उससे आय अर्जित कर रहे हैं। यह इकाई स्थानीय रोजगार सृजित करने के साथ-साथ आधुनिक कम्पोस्टिंग तकनीकों का लोगों को प्रशिक्षण भी दे रही है।
ग्रेटर चेन्नई में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत नारियल कचरा प्रसंस्करण इकाइयां संचालित की जा रही हैं। दिसंबर 2021 से अब तक यहां लगभग 1.5 लाख टन कचरा प्राप्त हुआ है, जिसमें से 1.15 लाख टन से अधिक कचरे को कॉयर और खाद में बदला जा चुका है। इन उत्पादों की मांग टायर कंपनियों, नर्सरी और कृषि क्षेत्र में तेजी से बढ़ी है।
इंदौर का एकीकृत नारियल कचरा मॉडल भी इस समय खासा चर्चा में है। यहां प्रतिदिन 20 टन नारियल कचरे को कोकोपीट और कॉयर में परिवर्तित किया जाता है और इसे बायो-सीएनजी संयंत्र से जोड़ा गया है। इससे किसी भी प्रकार का कचरा व्यर्थ नहीं जाता और पूरी प्रक्रिया चक्रीय अर्थव्यवस्था का उदाहरण बन गयी है।
पटना में शून्य लागत वाला नारियल कचरा मॉडल अपनाया गया है। यहां प्रतिदिन 10 टन नारियल कचरे को कॉयर, कोकोपीट और जैविक खाद में बदला जा रहा है, जिससे कचरे को लैंडफिल में जाने से रोका जा रहा है।
सरकारी योजनाएं इस बदलाव को और मजबूती दे रही हैं। एसबीएम-यू 2.0 के तहत कचरा प्रसंस्करण इकाइयों के लिए 25 से 50 प्रतिशत तक केंद्रीय वित्तीय सहायता दी जा रही है। कॉयर उद्यमी योजना और गोवर्धन योजना जैसी पहलें नारियल कचरे को कचरा से धन में बदलने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
मंदिर नगरों से लेकर महानगरों तक, नारियल कचरे को संसोधित करने (पुनर्चक्रण) की यह यात्रा यह साबित करती है कि जब नीति, तकनीक और जनभागीदारी एक साथ आती है, तो कचरा भी संपदा बन सकता है और स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर शहरों की नींव रखी जा सकती है।
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