नयी दिल्ली , दिसंबर 15 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया कि वह राज्य में जवाहर नवोदय विद्यालय (जेएनवी) बनाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ प्रत्यक्ष चर्चा करे और अदालत के समक्ष एक रिपोर्ट जमा करवाये।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन ने प्रशासन को निर्देश दिया कि वह तमिलनाडु के हर जिले में जेएनवी बनाने के लिये ज़रूरी ज़मीन निर्धारित करें। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह कार्यवाही सिर्फ शुरुआती जांच के लिये थी।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सहकारी संघवाद की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि "मेरा राज्य, मेरा राज्य" वाला रवैया नहीं अपनाना चाहिए। एक रचनात्मक संघीय बातचीत की ज़रूरत है। बातचीत के दौरान राज्य अपनी शर्तें रखने के लिए आज़ाद है वह जेएनवी द्वारा अपनाए जाने वाले तीन-भाषा फॉर्मूले के बजाय अपनी वैधानिक दो-भाषा नीति का पालन कर सकता है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "इस पर केंद्र सरकार के स्तर पर चर्चा होनी चाहिये। अगर आप एक कदम आगे बढ़ाएंगे, तो वे भी एक कदम आगे बढ़ाएंगे। हो सकता है वे दो कदम आगे बढ़ाएं। इसे थोपा जाना न समझें। इसे छात्रों के लिए एक मौके के तौर पर देखें। आप अपनी भाषा नीति और दूसरी चिंताओं को केंद्र सरकार के सामने रख सकते हैं, और वे इस पर विचार करेंगे। हम फिलहाल सिर्फ शुरुआती कार्यवाही कर रहे हैं। हम यह नहीं कह रहे कि आप आज ही (विद्यालय का) शिलान्यास कर दें।"उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय तमिलनाडु की ओर से दायर की गयी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है , जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गयी थी जिसमें अदालत ने राज्य सरकार को हर जिले में जेएनवी बनाने का निर्देश दिया था।

राज्य की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने तमिलनाडु की आपत्तियों को दोहराते हुए कहा कि जेएनवी तीन-भाषा फॉर्मूले का पालन करते हैं, जबकि राज्य में दो-भाषा नीति लागू है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य को हर जिले में लगभग 30 एकड़ ज़मीन देनी होगी और इससे जुड़े खर्च भी उठाने होंगे।

श्री विल्सन ने कहा कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत केंद्र सरकार पर उसके 3,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा बकाया हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर सहयोग न करने का आरोप लगाया। यह भी तर्क दिया गया कि उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाला गैर-सरकारी संगठन "बैकडोर एंट्री" पाने के लिए बनाया गया था और राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही थी। इन दलीलों पर जवाब देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मामले को भाषा विवाद में बदलने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "इसे भाषा का मुद्दा न बनायें। हम एक संघीय समाज हैं, और आप गणतंत्र का हिस्सा हैं। अगर आप एक कदम आगे बढ़ाएंगे, तो केंद्र भी एक कदम आगे बढ़ाएगा।"पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार का ध्यान ग्रामीण छात्रों को अच्छी शिक्षा देने पर है, न कि भाषा थोपने पर।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुझाव दिया कि तमिलनाडु परामर्श के दौरान केंद्र के सामने अपनी सभी चिंताएं रख सकता है, जिसमें उसकी दो-भाषा नीति और लंबित वित्तीय बकाए का निपटारा शामिल है।

न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने कहा कि प्रस्तावित बातचीत के दौरान सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने दोनों पक्षों को सार्वजनिक बयान देने से बचने और सीधे एक-दूसरे से बात करने की भी सलाह दी।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज पेश हुए। उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले संगठन कुमारी महासभा की ओर से अधिवक्ता जी. प्रियदर्शिनी और राहुल श्याम भंडारी पेश हुए।

इससे पूर्व, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा था कि जेएनवी तमिलनाडु तमिल शिक्षण अधिनियम, 2006 का उल्लंघन नहीं करते हैं। अदालत ने राज्य को हर जिले में 240 छात्रों के लिए अस्थायी आवास प्रदान करने का निर्देश दिया था।

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