लुधियाना , जनवरी 04 -- पंजाब में लुधियाना के जीवन नगर में रविवार को कारख़ाना मज़दूर यूनियन और टेक्सटाइल होज़री कामगार यूनियन द्वारा केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार नए श्रम क़ानूनों के ख़िलाफ़ संयुक्त सम्मेलन किया गया।

कारख़ाना मज़दूर यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह ने कहा कि सम्मेलन में केंद्र सरकार से चारों श्रम संहिताएँ रद्द करने , छीने गए क़ानूनी श्रम अधिकार बहाल किए जाने और श्रम क़ानूनों को मज़दूरों के पक्ष में मज़बूत किए जाने की मांग की गयी।। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा की जगह जी-राम-जी योजना लागू करने, प्रस्तावित बिजली संशोधन और बीज संशोधन क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित किए गए।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का यह दावा कि श्रम क़ानूनों में बदलाव मज़दूर वर्ग के भले के लिए किए गए हैं, सरासर झूठ है। असल में नए क़ानून देशी-विदेशी पूँजीपतियों के फ़ायदे के लिए मज़दूर वर्ग की लूट को और तेज़ करने के लिए लाए गए हैं। क़ानूनों में मज़दूर-विरोधी संशोधनों के ख़िलाफ़ देश भर मज़दूरों और अन्य इंसाफ़पसंद लोगों द्वारा व्यापक स्तर पर आवाज़ बुलंद की जाती रही है, लेकिन जनविरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए मोदी सरकार ने नए श्रम क़ानून लागू कर दिए हैं। काम के घंटे, रोज़गार सुरक्षा, ईपीएफ़, ग्रेच्युटी, दुर्घटनाओं और बीमारियों से सुरक्षा, महिला मज़दूरों के विशेष अधिकारों, यूनियन बनाने, हड़ताल करने आदि मूलभूत श्रम अधिकारों पर तीखा हमला किया गया है।

श्री सिंह ने कहा कि मज़दूर-विरोधी श्रम सुधारों की शुरुआत भारत में उदारीकरण-निजीकरण-विश्वीकरण की नीतियों के तहत कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के ज़माने में ही हो चुकी थी। पंजाब की आम आदमी पार्टी ने केंद्रीय क़ानून लागू होने से पहले ही अपने स्तर पर पंजाब में मज़दूरों के अनेक क़ानूनी श्रम अधिकार छीने हैं। इसलिए मज़दूर वर्ग किसी एक या दूसरी पूँजीवादी पार्टी के पीछे लगकर अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ सकता। मज़दूर वर्ग को अपनी एकता और संगठन पर भरोसा रखते हुए अपने क़ानूनी श्रम अधिकार बहाल कराने के लिए संघर्ष तेज़ करना होगा।

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