बेंगलुरु , अप्रैल 02 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कथित धर्मस्थल सामूहिक दफ़न मामले में एक वीडियो के जरिए गलत सूचना फैलाने और सार्वजनिक अशांति भड़काने के आरोपी यूट्यूबर को अंतरिम राहत प्रदान की है।

'दूत' यूट्यूब चैनल चलाने वाले एम.डी. समीर ने अपने खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज प्राथमिकी (एफ़आईआर) को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता पर गलत सूचना फैलाने और सार्वजनिक शरारत के लिए उकसाने वाले बयान देने के आरोप हैं।

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आगे की जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह संबंधित वीडियो की सामग्री की जांच करने के बाद अपनी आपत्तियां दर्ज करे।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह अदालती कार्यवाही संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। यह भी तर्क दिया गया कि विवादित वीडियो एक व्यापक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा था, क्योंकि कथित धर्मस्थल दफ़न का मुद्दा पहले से ही मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट किया जा चुका था।

याचिकाकर्ता का कहना है कि दर्ज प्राथमिकी अस्पष्ट आरोपों पर आधारित है और इसमें बीएनएस की धाराओं के तहत आवश्यक 'इरादे' को साबित करने में विफलता दिखती है। वकील ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कई मामले दर्ज करना उत्पीड़न और आपराधिक कानून का दुरुपयोग है, जिसका स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता पर बुरा असर पड़ सकता है।

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