विद्या शंकर रायलखनऊ , फरवरी 12 -- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2022 में उत्तर प्रदेश के पूर्व संगठन मंत्री सुनील बंसल के प्रमोशन के बाद प्रदेश संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी धर्मपाल सिंह को दी थी। भाजपा सूत्रों की मानें तो जब उनको दायित्व सौंपा गया था तब उनकी कार्य क्षमता को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन एबीवीपी पृष्ठभूमि से आने वाले धर्मपाल सिंह ने अपने माइक्रोमैनेजमेंट के बूते भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को ऐसी नई धार दी जिससे पुराने रिकार्ड ध्वस्त हो गए। हालाकि उनके सामने 2027 विधानसभा चुनाव के रूप में एक बड़ी चुनौती भी है जिससे पार पाना इतना आसान नहीं होगा।

दरअसल मूल रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर निवासी धर्मपाल सिंह, सैनी समाज से आते हैं। सैनी बिरादरी प्रदेश, खासकर पश्चिमी यूपी में प्रभावशाली ओबीसी वर्ग मानी जाती है। संगठनात्मक और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से उनकी नियुक्ति रणनीतिक तौर पर की गई थी।

धर्मपाल सिंह लंबे समय तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) में सक्रिय रहे। छात्र राजनीति से लेकर भाजपा संगठन तक उनका सफर अनुशासन और रणनीतिक कार्यशैली के लिए जाना जाता है। वर्ष 2017 से वे झारखंड में भाजपा के संगठन महामंत्री के तौर पर कार्यरत थे। वहां उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, नियमित समीक्षा बैठकों और कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद की परंपरा को सशक्त किया जिससे पार्टी को काफ़ी मजबूती मिली थी।

भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, " धर्मपाल सिंह की सबसे बड़ी ताकत कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क और व्यक्तिगत संवाद है। वे कार्यकर्ताओं को नाम से पुकारने और फीडबैक आधारित निर्णय लेने के लिए पहचाने जाते हैं। संगठन के हर छोटे-बड़े मुद्दे पर उनकी पैनी नजर रहती है।"वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, " उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सदस्यता के क्षेत्र में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पार्टी ने दो करोड़ से अधिक सदस्य जोड़ने का काम किया है। इस अभियान की मॉनिटरिंग में प्रदेश महामंत्री संगठन के रूप में धर्मपाल सिंह की अहम भूमिका रही। इस उपलब्धि को नकारा नहीं जा सकता। पूर्व संगठन मंत्री सुनील बंसल के समय में भी सदस्यता संख्या इतनी नहीं पहुँच पाई थी।"दरअसल, कुछ समय पहले ही पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदस्य बनाकर अभियान की शुरुआत की थी। प्रदेश में इसकी शुरुआत पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सदस्यता दिलाकर की थी।

इस सदस्यता अभियान को काफी गंभीरता से संचालित किया गया। संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह लगातार क्षेत्रवार और जिलावार समीक्षा करते रहे, वहीं ढिलाई बरतने वाले पदाधिकारियों को सख्त संदेश भी दिया। जिसका असर रहा कि सदस्यता संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि हुई।

भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि, " भाजपा अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर संगठन और मंत्रिमंडल में संभावित बदलावों पर मंथन कर रही है। मंत्रियों और पदाधिकारियों की परफॉर्मेंस की समीक्षा के साथ जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को साधने की कवायद तेज हो गई है। हाल के दिनों में ब्राह्मण, ठाकुर समेत विभिन्न सामाजिक समूहों की बैठकों और महोबा में कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और भाजपा विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच हुए टकराव को लेकर पार्टी ने गंभीर रूख अपनाया है।"उन्होंने कहा कि धर्मपाल सिंह की कार्यशैली, संगठन पर पकड़ और सामाजिक समीकरण साधने की क्षमता भाजपा के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि संगठन महामंत्री के 'माइक्रो मैनेजमेंट' और बूथ सशक्तिकरण के मॉडल के जरिए 2027 की राह और मजबूत होगी।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी । समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिली थीं जबकि भाजपा को महज 33 सीटों से संतोष करना पड़ा था। इन दो दलों के अलावा कांग्रेस पार्टी को छह, रालोद को दो, अपना दल एस और आजाद समाज पार्टी को एक-एक सीट नसीब हुई है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की इस हार से कई सवाल भी खड़े हुए थे। उत्तर प्रदेश में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन की वजह से ही भाजपा पूर्ण बहुमत से दूर रह गई थी। हालाकि पार्टी सूत्रों की माने तो लोकसभा चुनाव में टिकट का बटवारा दिल्ली से हुआ था लिहाजा उसमे उत्तर प्रदेश नेतृत्व की ज़्यादा भूमिका नहीं थी।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो लोकसभा चुनाव में मिली हार की भरपाई भाजपा 2027 में उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में जरूर करना चाहेगी लेकिन इसके लिए भाजपा को जहां एक तरफ़ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के पीडीए की काट निकालनी पड़ेगी वहीं पार्टी के भीतर अंदरूनी जातीय गुटबाजी और यूजीसी जैसे मुद्दों से भी सावधान रहना होगा।

यूजीसी मुद्दे को लेकर आम जनमानस खासतौर से भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में ही भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है उससे बड़ा नुकसान होने की आशंका है। हालाकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी बातचीत के दौरान इस बात को स्वीकार किया कि यूजीसी के मुद्दे को लेकर पार्टी काफ़ी गंभीर है और इससे निपटने की रणनीति तैयार की जा रही है।

हालाकि विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत स्तर के चुनाव में भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं । चुनाव का मोर्चा खुलने से पहले ही एनडीए के सहयोगियों में बिखराव देखने को मिल रहा है।

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