बक्सर , नवम्बर 23 -- अमेरिका के वेलस्पन अस्पताल के वरिष्ठ फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ तारकेश्वर तिवारी ने रविवार को कहा कि देश में जल जीवन और रहन सहन में बढते प्रदूषण से फेफड़ों सहित कई अन्य अंगों में कैंसर होने का खतरा तेजी से बढ़ाता जा रहा है और भारत में लोगों के इलाज के लिए पर्याप्त बुनियादी चिकित्सा व्यवस्था अभी भी विकसित नहीं हुई है।

अमेरिका से बक्सर जिले के सोनबरसा में अपनी माता पिता को देखने आये डॉ तिवारी ने आज यहां कहा है कि हिंदुस्तान के अधिकांश इलाकों में बढ़ते प्रदूषण और आम जीवन के उपयोग में आने वाली वस्तुओं में जहरीली मिलावट के चलते बहुत से लोगों में फेफड़े में कैंसर का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि बहुत से इलाकों में तो शुरूआती जाँच के ऐसे रोगियों की स्क्रीनिंग तक की सुविधा नहीं है।

डॉ तिवारी ने कहा कि बक्सर जिले सहित देश में पेयजल भी सुरक्षित नहीं है। पानी में आर्सेनिक का स्तर बढ़ा हुआ है और लोग दूषित अन्न, सब्जी, दूध और अन्य खानपान की वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी प्रदूषित खानपान की वस्तुओं के साथ वायु प्रदूषण ने हालत और और बिगाड़ दिया है।

डॉ तिवारी ने कहा कि लैंसेट के ई-क्लिनिकल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक हालिया शोध से पता चला है कि भारत में फेफड़े के कैंसर के बहुत से रोगी ऐसे भी हैं, जो धूम्रपान नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा बढ़ते वायु प्रदूषण के संपर्क में लोगों की आने से हो रहा है। उन्होंने कहा को भारत में डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित हैं।

डॉक्टर ने बताया कि फेफड़े के कैंसर का कारक सिगरेट, पाइप या सिगार पीना है, मगर धूम्रपान न करने वालों में भी कैंसर के बढ़ते मामले देखने को मिल रहे हैं, जिसके पीछे मुख्य रूप से पैसिव स्मोकिंग, रेडॉन, वायु प्रदूषण, एस्बेस्टस (अभ्रक) और पारिवारिक इतिहास शामिल है। लंबे समय तक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के संपर्क में रहने से फेफड़े की कोशिकाओं में परिवर्तन हो सकता है, जिससे अनियंत्रित रूप से कोशिका वृद्धि हो सकती है। उन्होंने बताया कि भारत में वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते मामलों का कारण बनता जा रहा है। पीएम 2.5 और जहरीली गैसों जैसे प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के ऊतकों (टिशू) को नुकसान पहुंचता है जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

डॉक्टर तिवारी ने कहा कि धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम प्रकार एडेनोकार्सिनोमा है, जो आमतौर पर फेफड़ों के बाहरी क्षेत्रों में शुरू होता है।

डॉक्टर ने बताया कि देश में शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हो रहा हैं और खाद्य पदार्थो में उर्वरक से लेकर कीटनाशक दवाओं का अंश भारी मात्रा में मिलता है, जिसके गंभीर दुष्प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर हो रहा है। यह इतना खतरनाक है कि कई रोगियों पर दवाएं भी निष्प्रभावी हो जाती हैं।

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