नयी दिल्ली , मार्च 25 -- लोक सभा में बुधवार को विपक्षी सदस्यों ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता कानून कंपनियों और बैंक के धन के लूट का माध्यम बन गया है।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशेाधन) विधेयक 2025 पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस की धनोरकर प्रतिभा सुरेश ने कहा कि कंपनियों को क्षमता से ज्यादा कर्ज देने से वे दिवालिया हो जाती हैं तथा बाद में औने-पौने दामों में दूसरी कंपनियों के मालिक उन्हें खरीद लेते हैं, जिससे बैंकों की राशि डूब जाती है। इस पूरे खेल में राजनीतिक लोग भी शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि बैंकों में अपनी बचत का पैसा जमा करने वाले किसान, मजदूर और महिलाओं का पैसा बड़े लोगों की जेब में चला जाता है।

सुश्री सुरेश ने कहा कि बैंकों का पैसा लेकर कई बड़े-बड़े उद्योगपति लेकर विदेश चले गये, उन्हें वापस नहीं लाया जा सका है। किसान और छोटे व्यापारी यदि कर्ज चुकाने में कुछ भी देरी करते हैं, तो बैंक उनकी सम्पत्तियां कुर्क कर लेते हैं और उन्हें अपमानित करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने 52 बड़े-बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ किये हैं लेकिन किसानों का मुट्ठी भर कर्ज माफ नहीं किया है।

भारतीय जनता पार्टी के अनुराग ठाकुर ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता विधेयक आने से पहले घाटे में जाने वाली कंपनियों को फिर से खड़ा करने में बहुत जटिलतायें थीं और कई-कई वर्ष लग जाते थे, लेकिन इस विधेयक के आने के बाद बड़ी संख्या में घाटे में चली गयी कंपनियों का पुनरुद्धार हुआ है।

श्री ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार के आने के बाद से बैंकों की गैर निष्पादित सम्पत्तियां 12 प्रतिशत से अधिक थीं जो अब घटकर 2.3 प्रतिशत रह गयी हैं।सरकारी बैंक मुनाफे में आ गये हैं। वित्तीय घाटा कम हुआ है और निवेश बढ़ा है। स्व सहायता समूह सुदृढ़ किये गये हैं और महिलाओं को कर्ज देने का प्रतिशत बहुत बढ़ा है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की सुधार एक्सप्रेस तेजी से चल रही है और आगामी दिनों में इसकी गति बढ़ायी जायेगी।

समाजवादी पार्टी के वीरेन्द्र सिंह ने कहा कि यह विधेयक छोटे व्यापारियों और बड़ी कंपनियों के बीच विभेद पैदा करता है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक आने के बाद से बैंकों की बहुत बड़ी राशि हड़प कर ली गयी है। उन्होंने कहा कि वीडियोकॉन,भूषण स्टील और कई अन्य बड़ी कपंनियों द्वारा बैंकों से लिया गया हजारों करोड़ रुपया इस कानून के माध्यम से डूब गया और कंपनियां दूसरों के नाम हो गयीं।

श्री सिंह ने कहा कि बड़ी-बड़ी कपंनियों का हजारों करोड़ रुपया 'राइट ऑफ' के नाम पर माफ कर दिया गया लेकिन किसानों का कर्ज माफ करने में सरकार हमेशा बहाने बनाती रही।

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