नयी दिल्ली , जनवरी 05 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश से संबंधित गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत मंजूर करने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने दोनों कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगाये गये आरोपों की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि वे मामले के अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं। न्यायालय ने हालांकि पांच अन्य सह-आरोपियों गुलफिशां फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की इस हिंसा में कथित भूमिकाओं को अलग बताते हुए उनकी जमानत अर्जी मंजूर कर ली।
यह फैसला आरोपियों की अलग-अलग दायर विशेष अनुमति याचिकाओं पर आया है। इसमें उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सितंबर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत मंजूर करने से इनकार कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि चूंकि आदेश लंबा है, इसलिए पीठ केवल कुछ ही अंश ही पढ़ेगी।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि इस मामले में त्वरित सुनवाई आवश्यक है। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया था कि जांच और सुनवाई में देरी के लिए अभियोजन पक्ष जिम्मेदार है। न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि देरी के कारण गहन न्यायिक जांच की स्थिति हो सकती है। संविधान में अनुच्छेद 21 का केंद्रीय स्थान है और सुनवाई से पहले जेल में रहने को सजा के रूप में नहीं माना जा सकता। स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में खड़े हैं और सचेत रूप से सामूहिक या एकीकृत दृष्टिकोण से परहेज किया गया है।
न्यायालय ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष की सामग्री अपीलकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप प्रकट करती है। इन अपीलकर्ताओं के मामले में वैधानिक सीमा लागू होती है और कार्यवाही के इस स्तर पर उनकी जमानत पर रिहाई उचित नहीं है।
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