दरभंगा , दिसंबर 13 -- बिहार के कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर दर्शन विभाग तथा महर्षि सांदीपनि वेद विद्यापीठ की देख रेख में 'वैदिक मंत्रों के दार्शनिक विश्लेषण' विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का आज समापन हो गया।

इस संगोष्ठी में देश भर से आये विद्वानों ने तीन दिनों और सात सत्रों में वैदिक मंत्रों का खूब मंथन किया और वैदिक मंत्रोचार की प्रमाणिकता तथा व्यवहारिक पक्ष को भी उजागर किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय ने आनो भद्रा: मंत्र की व्याख्या करते हुए सभी प्राणियों के लिए सम्भाव रखने की बातें कही। साथ ही उन्होंने संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों से आये विशिष्ट विद्वानों के प्रति साधुवाद भी प्रकट किया।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि पद्मश्री पुरस्कार से विभूषित पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने अपने प्रेरक उद्बोधन में वैदिक ज्ञान-परम्परा की वैज्ञानिकता, प्रामाणिकता एवं वैश्विक प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला और कार्यक्रम के अंत में अपनी सशक्त और भावपूर्ण कविताओं के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

संगोष्ठी के दौरान प्रो.सुरेश्वर झा ने वेद को स्वत: प्रमाण के रूप में परिभाषित करते हुए वैदिक मंत्रों का दार्शनिक विश्लेषण किया।

गया से आये डा. संजय कुमार उर्फ सुदर्शनाचार्य महाराज ने असतो मा सद्गमय, सत्यं वद,धर्मं चर, आचार्य देवो भव जैसे वैदिक सुक्तियों को परिभाषित किया।

अन्य सत्र की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो.कमलेश कुमार झा ने मंडन मिश्र, बच्चा झा, उदयनाचार्य, आदि महापुरुषों के दर्शन में योगदान के बारे में जानकारी दी,वहीं पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना विकसित करने पर बल दिया।

प्रो.जयशंकर झा ने वैदिक मंत्रों की लौकिक जीवन में उपयोगिता पर बल दिया। समापन सत्र में आगत अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी के कुलसचिव प्रो.ब्रजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि मिथिला ज्ञान की धरती रही हैं। दर्शन व मीमांसा का यहां लम्बा इतिहास है। उन्होंने वेद के अध्ययन पर भी जोर दिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ.शशिकांत तिवारी तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.सुधीर कुमार ने किया।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित