साेल , नवंबर 18 -- दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय सभा ने जापान की इतिहास संबंधी धारणा पर चिंता जताई है।
राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष वू वोन-शिक ने कहा है कि जापानी सरकार ने तथाकथित 'क्षेत्रीय संप्रभुता प्रदर्शनी हॉल' का विस्तार करके भारी गड़बड़ी की है। उल्लेखनीय है कि श्री शिक का यह जवाब जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के उस दावे के संदर्भ में आया है जिसमें कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अधीन दोक्दो ऐतिहासिक रूप से जापानी क्षेत्र है।
वर्ष 2018 में दोक्दो के क्षेत्रीय संप्रभुता प्रदर्शनी हॉल के खुलने के बाद से दक्षिण कोरिया इसे बंद करने की मांग करता रहा है। जापान ने हाल ही में हॉल में एक और शैक्षणिक स्थान जोड़ा है, जो आने वाली पीढ़ियों में गलत धारणाएं पैदा करने की एक कोशिश है।
श्री वू ने कहा, "(दक्षिण) कोरिया और जापान के बीच संबंधों को मजबूत करने के खयाल से तीन बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए- इतिहास की गलतियों को नहीं दुहराना, आर्थिक सहयोग को गहरा करना और कोरियाई प्रायद्वीप तथा पूर्वोत्तर एशिया में शांति के लिए साझेदार के रूप में सहयोग करते रहना।"उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया इस वर्ष साडो द्वीप स्वर्ण खदानों में जबरन श्रम के शिकार कोरियाई लोगों के लिए स्वयं का स्मारक समारोह आयोजित करेगा क्योंकि जापान ने अपने स्मारक भाषण में 'जबरन श्रम' का कोई उल्लेख नहीं किया है।
दक्षिण कोरियाई इतिहासकारों का कहना है कि जापान ने हजारों कोरियाई लोगों को इस स्वर्ण खदान में जबरन श्रम करने के लिए मजबूर किया। इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध-संबंधी सामग्रियों के निर्माण के लिए संयंत्रों में बदल दिया गया था। उस समय कोरियाई प्रायद्वीप जापान के अधीन था।
श्री शिक ने जापान द्वारा अपने तथाकथित शांति संविधान में संशोधन करने के हालिया कदमों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह केवल दक्षिण कोरिया ही नहीं बल्कि सभी पड़ोसी देशों को भी अस्वीकार्य है क्योंकि यह जापान को युद्ध-सक्षम देश में बदलकर पूर्वी एशिया में शांति व्यवस्था की नींव हिला रहा है।
दक्षिण कोरिया लंबे समय से जापान के उस नए क्षेत्रीय दावों का विरोध करता रहा है जिसमें दोनों देशों के बीच स्थित विवादित द्वीपों जिन्हें दक्षिण कोरिया दोक्दो और जापान ताकेशिमा कहता है। उल्लेखनीय है कि 1910-1945 के जापानी औपनिवशीकरण से कोरियाई प्रायद्वीप की मुक्ति के बाद दक्षिण कोरिया ने दोक्दो पर अपनी संप्रभुता बहाल कर दी थी।
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