अगरतला , जनवरी 09 -- त्रिपुरा उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने शुक्रवार को राज्य सरकार की 25 वर्ष पुरानी उस नीति को रद्द कर दिया, जिसके तहत प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से नियुक्त नए कर्मचारियों को शुरुआती पाँच वर्षों तक निश्चित वेतन पर रखा जाता था। न्यायालय ने इस नीति को "असंवैधानिक" करार दिया।

राज्य में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने 2001 और 2007 में आदेश जारी कर एक नीति लागू की थी, जिसके तहत स्वीकृत समूह 'ग' और 'घ' पदों पर भर्ती किये गये कर्मचारियों को कम से कम पांच साल निश्चित वेतन पर सेवा करनी होती थी। इसके बाद उन्हें नियमित वेतनमान दिया जाता था। वर्ष 2018 में सत्ता में आयी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने भी इस प्रथा को जारी रखा था।

इस पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) से नियुक्त शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने उच्च न्यायालय में राहत के लिए अर्जी दी। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद न्यायालय ने आज निर्णय दिया कि टीईटी पात्रता प्राप्त शिक्षकों समेत सभी सरकारी कर्मचारी अपनी सेवा के पहले दिन से ही नियमित वेतनमान पाने के हकदार हैं।

अधिवक्ता पुरुषोत्तम रॉय बर्मन ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश एम. एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित की खंडपीठ ने इस नीति को चुनौती देने वाली दीर्घावधि से लंबित दो रिट याचिकाओं का निपटारा किया है। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार का यह निर्णय कि नियुक्ति के बाद पहले पाँच वर्षों तक कर्मचारियों को केवल निश्चित वेतन दिया जाएगा, इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। अब उच्च न्यायालय ने इस दलील को सही ठहराया है।

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