गया, जनवरी 13 -- भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली के रूप में मशहूर और हिंदुओं का मोक्षधाम गया जी में तिलकुट का बाजार गुलजार हो गया है।
14 जनवरी मकर संक्राति को लेकर बिहार के गया जी में तिलकुट की दुकानें सज गई हैं। गया जी में तिलकुट की मुख्य मंडी रमना रोड, जीबी रोड और टिकारी रोड में है, जहां खरीददारी करने लोग दूर-दूर से आ रहे है। मकर संक्रांति के एक महीने पहले से ही गया की सड़कों पर तिलकुट की सोंधी महक और तिल कूटने की धम-धम की आवाज लोगों के जेहन में इस पर्व की याद दिला देती है। पर्व के एक से डेढ़ महीने पूर्व से यहां तिलकुट बनाने का काम शुरू हो जाता है। मोक्षनगरी में हाथ से कूटकर बनाए जाने वाले तिलकुट बेहद खस्ता होते हैं।
गया जी में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यहां के तिलकुट के स्वाद का जोड़ कहीं नहीं है। यही वजह है कि गया जी में निर्मित तिलकुट झारखंड, उतरप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल जैसे देशों में भी भेजी जाती है। गया जी आने-जाने वाले लोग यहां के तिलकुट का स्वाद जरूर लेते है और अपने दूर-दराज के रिश्तेदारों के लिए भी झोले में भरकर तिलकुट को ले जाते है।
तिलकुट व्यवसाय से जुड़े लोग बताते है कि तिल और चीनी से तिलकुट का निर्माण किया जाता है। इसके लिए एक निश्चित मात्रा में तिल और चीनी के मिश्रण को कोयले की आग पर निश्चित समय सीमा तक मिलाया जाता है और एक निश्चित समय तक इसे कूटा जाता है। जिसके बाद लजीज और जायकेदार खास्ता तिलकुट खाने के लिए तैयार हो जाता है। मिश्रण और कूटने की प्रक्रिया में थोड़ी भी गड़बड़ी होती है तो स्वाद बिगड़ने का डर रहता है ।
गया जी के तिलकुट के स्वाद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी महीने में बोधगया आने वाला कोई भी पर्यटक गया का तिलकुट ले जाना नहीं भूलता। पर्यटक चाहे देसी हों या विदेशी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संक्राति के दिन तिल खाना एवं तिल की वस्तु दान देने से पुण्य मिलता है। गया जी में तिलकुट बनाने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन आम धारणा है कि धर्म नगरी गया में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तिलकुट बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ।
तिलकुट की तासीर गर्म होती है, इसलिए ठंड के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है। यह आर्येुवेदिक दवा का भी काम करता है। तिलकुट खाने से कब्जयत जैसी बीमारी नहीं होती है और यह पाचन क्रिया को भी बढ़ाता है । वैसे तो पूरे देश में कई जगहों पर तिलकुट का व्यवसाय होता है, लेकिन गया जी में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है ।
गया जी में चीनी के अलावा गुड़, नारियल और खोवा का भी तिलकुट बनाया जाता है। जो विभिन्न दरों पर बाजार में बेचा जा रहा है। खरीदारों का कहना है कि मकर संक्रांति पर तिल खाने का विशेष महत्व होता है। खासकर नदी में स्नान करने के बाद दान-पुण्य किया जाता है। इसके बाद तिल खाने की पुरानी परंपरा है। खरीदार सिर्फ अपने परिवार के लिए ही नहीं बल्कि रिश्तेदारों के लिए भी खरीदारी कर रहे हैं। वह दूसरे देश में रहने वाले थाईलैंड, और सिंगापुर जैसे देशों में भी अपने परिजनों को तिलकुट भेज रहे हैं।
स्थानीय दुकानदार मनीष कुमार गुप्ता का कहना है कि गया का वातावरण तिलकुट के लिए काफी बेहतर माना जाता है, यहां का वातावरण और पानी तिलकुट को एक अलग स्वाद देता है।यही वजह है कि पूरे भारतवर्ष में कई जगह तिलकुट बनने के बावजूद गया जी के तिलकुट का स्वाद अलग होता है। तिल और चासनी मिलाने के बाद धीमी आंच पर सेका जाता है और काफी देर कुटाई करने के बाद यह तैयार किया जाता है, जिसके बाद यह खाने लायक होता है। वह वर्षों से तिलकुट का व्यवसाय कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि चीनी का तिलकुट 400 रुपये किलो, खोवा और गुड़ का तिलकुट 500 रुपये किलो के हिसाब से बिक रहा है।उन्होंने कहा कि हमारे यहां का तिलकुट विदेश में भी भेजा जाता है।
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