चेन्नई , जनवरी 20 -- तमिलनाडु सरकार ने आज स्पष्ट किया कि वह लंबे समय से चली आ रही अपनी द्विभाषा नीति पर कायम रहेगी और केंद्र की त्रिभाषा नीति वाली नयी शिक्षा नीति को नकारती है। राज्य में हिंदी थोपने के खिलाफ अपना विरोध दोहराते हुए सरकार ने केंद्र की नयी शिक्षा नीति को खारिज कर दिया है।
राज्य विधानसभा में अपने पारंपरिक नववर्ष अभिभाषण में राज्यपाल आर एन रवि ने मंगलवार को कहा कि राज्य सरकार ने केंद्र की नयी शिक्षा नीति में निर्धारित त्रिभाषा नीति को स्वीकार नहीं किया है।
भले ही तमिलनाडु के वैध अनुदानों को रोक दिया गया है, जिससे राज्य पर भारी वित्तीय बोझ पड़ा है। फिर भी इस सरकार ने लगातार इस बात को दोहराया है कि वह केंद्र सरकार के त्रिभाषा नीति को स्वीकार नहीं करेगी।सरकार की प्रकाशित तमिलनाडु राज्य शिक्षा नीति इस बात की पुष्टि करती है कि द्विभाषा नीति ही हमेशा से तमिलनाडु की नीति रही है।
उन्होंने कहा, "हमने पेरारिग्नार अन्ना (द्रमुक के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुरई) की 1968 में तैयार की गयी द्विभाषा शिक्षा नीति को अपनी आंखों की पुतली की तरह सुरक्षित रखा है। जब तमिल भाषा की रक्षा की बात आती है तो कोई समझौते की गुंजाइश नहीं हो सकती। तमिल भाषा हमारे जीवन और भावनाओं का अभिन्न हिस्सा है। मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के नेतृत्व में यह सरकार इस नीति में किसी भी बदलाव को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगी।"हिंदी थोपने पर उन्होंने कहा कि इस विधानसभा ने कई मौकों पर हिंदी भाषा थोपने के विरोध में प्रस्ताव पास किये हैं। इस सरकार के पदभार ग्रहण करने के बाद 2022 में विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें केंद्र सरकार से अनुरोध किया गया था कि वह संसदीय समिति की राजभाषा की सिफारिशों को लागू न करे, जिसमें केंद्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में हिंदी को माध्यम बनाने का प्रस्ताव शामिल था।
हाल ही में हालांकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी उच्च शैक्षणिक संस्थानों में तीसरी भाषा को पढ़ाने का परिपत्र जारी किया है।राज्य सरकार इसे हिंदी भाषा थोपने के अप्रत्यक्ष कोशिश के रूप में देखती है और केंद्र सरकार से इसे लागू न करने का दृढ़ता से आग्रह करती है।
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