नयी दिल्ली/तमिलनाडु , जनवरी 15 -- तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में कोंडागई झील से मिले 4500 साल पुराने जलवायु रिकॉर्ड से भारत के जलवायु इतिहास को समझने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हाथ लगी है। वैज्ञानिकों के अध्ययन में इस झील के नीचे छिपे लगभग 4500 वर्षों पुराने जलवायु और पारिस्थितिकी बदलावों के प्रमाण सामने आए हैं, जो भविष्य के जल प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और आपदा तैयारी में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

यह शोध बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), लखनऊ के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'होलोसीन' में प्रकाशित हुए हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, अंतर्देशीय तमिलनाडु में अब तक बहुत कम ऐसे झील आधारित रिकॉर्ड उपलब्ध थे, जिनकी सटीक समय-सीमा तय की जा सके। जबकि यह क्षेत्र पूर्वोत्तर मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। कोंडागई झील, जो प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल कीलाडी के पास स्थित है। कीलाडी में संगम कालीन उन्नत शहरी सभ्यता के प्रमाण मिले हैं, जो तमिल इतिहास को छठी शताब्दी ईसा पूर्व या उससे भी पहले तक ले जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने माना कि प्राचीन बस्तियों के पास स्थित यह झील अतीत के मानसूनी उतार-चढ़ाव, पर्यावरणीय बदलाव और मानव बसावट के बीच संबंध समझने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।

शोध के तहत झील से एक मीटर से अधिक गहराई तक तलछट (सेडिमेंट) का नमूना निकाला गया। इसमें 32 बारीकी से चुने नमूने लिए गए, जिनमें से हर नमूना एक अलग समय खंड का प्रतिनिधित्व करता है।

इन नमूनों के विश्लेषण के लिए वैज्ञानिकों ने स्थिर समस्थानिक (स्टेबल आइसोटोप) अध्ययन, पराग कणों का विश्लेषण, दाने के आकार की जांच और रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।

इन तरीकों से वैज्ञानिकों ने अतीत की वर्षा, वनस्पति, झील के जलस्तर और बाढ़ की घटनाओं को अत्यंत सटीकता से पुनर्निर्मित किया।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पिछले 4500 वर्षों के दौरान तीन प्रमुख जलवायु चरणों की पहचान की। इस अध्ययन में 4.2 हजार वर्ष पूर्व का शुष्क काल,3.2 हजार वर्ष पूर्व का सूखा चरण, और रोम में गर्म अवधि (रोमन वार्म पीरियड) की पड़ताल की गयी।

इन सभी चरणों का सीधा संबंध मानसून की तीव्रता, झील की जल-प्रणाली और मानव गतिविधियों से जोड़ा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन ने प्राचीन मानव समाजों और उनके पर्यावरण को किस तरह प्रभावित किया।

यह शोध तमिलनाडु जैसे जलवायु-संवेदनशील राज्य में भविष्य की मानसून भविष्यवाणी को बेहतर बनाने में मदद करेगा। 4500 साल का जलवायु आधार मिलने से सूखा, अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसी घटनाओं का पूर्वानुमान अधिक सटीक हो सकेगा।

इसके साथ ही यह अध्ययन शिवगंगा और मदुरै जैसे सूखा-प्रवण जिलों में जल संसाधन प्रबंधन के लिए भी उपयोगी साबित होगा। झील के जलस्तर में आए पुराने उतार-चढ़ाव, तलछट के प्रवाह और हाइड्रोलॉजिकल बदलावों से जलाशय पुनरुद्धार, भूजल रिचार्ज, टैंक सुधार और जल-स्मार्ट कृषि योजनाओं को दिशा मिलेगी।

शोध में प्राचीन बाढ़ जमाव, भूमि अस्थिरता और तलछट प्रवाह के संकेत भी मिले हैं, जो जोखिम मानचित्रण और आपदा तैयारी के लिए उपयोगी हैं। इससे वैगई नदी बेसिन में बाढ़ और भूमि क्षरण के संभावित क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।

कीलाडी के पास स्थित होने के कारण यह अध्ययन पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी अहम है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्राचीन सभ्यताओं ने जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पर्यावरणीय दबावों का सामना कैसे किया।

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