चंडीगढ़ , जनवरी 10 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा के उपाध्यक्ष परमजीत सिंह कैंथ ने शनिवार को कहा कि पंजाब सरकार का 'युद्ध नशों विरुद्ध' असफल साबित हुआ है और सरकार की नीतियां ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
श्री कैंथ ने कहा कि पिछले लगभग चार वर्षों में नशे के कारण करीब 280 लोगों की जान जा चुकी है। ओवरडोज़ और नकली दवाओं से लगातार बढ़ रही मौतें इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि सरकार न तो नशे की आपूर्ति पर प्रभावी नियंत्रण कर पायी है और न ही लोगों की जान बचाने के लिए कोई ठोस व्यवस्था खड़ी कर सकी है। इस विफलता का सबसे गंभीर असर अनुसूचित जाति समुदाय और पंजाब के युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई में डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण है, उन्होंने मान सरकार से विस्तृत और अद्यतन जानकारी जारी करने का आग्रह किया।
उन्हाेंने कहा कि नशे की समस्या का सबसे गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव पंजाब के युवाओं तथा गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है। बेरोज़गारी, आर्थिक तंगी तथा शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की कमी ने युवाओं को नशे की ओर धकेल दिया है। पर्याप्त, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण इलाज व पुनर्वास सुविधाओं के अभाव में यही वर्ग सबसे अधिक पीड़ित हो रहा है, जिससे न केवल उनका वर्तमान बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधकारमय हो रहा है। नशे का बढ़ता प्रकोप ग़रीबी के दुष्चक्र को और गहरा कर रहा है तथा सामाजिक असमानता को बढ़ावा दे रहा है।
भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि नीति निर्माण और ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच व्यापक अंतर है। सरकार के बड़े बड़े दावों और अनेक अभियानों के बावजूद ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर नशे की आपूर्ति श्रंखला को तोड़ने में वह लगातार विफल रही है। पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की कमी, साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के आरोपों ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों की विश्वसनीयता को कमजोर किया, जिसका सीधा लाभ नशा माफिया को मिला।
श्री कैंथ ने कहा कि इलाज और पुनर्वास के मोर्चे पर भी सरकार पूरी तरह विफल रही है। सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या सीमित है, उनकी गुणवत्ता असंगत है और फॉलो-अप व्यवस्था बेहद कमजोर है, जिसके परिणामस्वरूप नशे की लत में दोबारा फंसने की दर लगातार ऊंची बनी हुई है। नशे की खपत, सप्लाई रूट्स और इलाज के परिणामों से जुड़ा पारदर्शी और अद्यतन डेटा अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे डेटा-आधारित नीति निर्माण संभव नहीं हो पा रहा है, जबकि अनुसूचित जाति समुदाय और पंजाब के युवाओं के भविष्य पर संकट लगातार मंडरा रहा है।
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