नयी दिल्ली , नवंबर 04 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपने के केंद्र सरकार के आवेदन पर नाराजगी व्यक्त की और सवाल किया कि क्या यह कदम मौजूदा पीठ से बचने का जानबूझकर किया गया प्रयास है, जो पहले ही इस मामले की व्यापक सुनवाई कर चुकी है।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ लंबे समय से लंबित मद्रास बार एसोसिएशन मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गयी है। कार्यवाही के दौरान, केंद्र की ओर से पेश हुए भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमण ने अदालत को सूचित किया कि केंद्र सरकार ने एक आवेदन पेश कर अनुरोध किया है कि मामले को एक बड़ी पीठ के समक्ष रखा जाये।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, " हमें उम्मीद नहीं है कि भारत संघ इस तरह की रणनीति अपनाएगा।"अटॉर्नी जनरल ने पीठ से इसे 'चाल' न कहने का जब आग्रह किया, तो मुख्य न्यायाधीश ने जवाब दिया, "यह... एक पक्ष को पूरी तरह सुनने के बाद, व्यक्तिगत आधार पर अटॉर्नी जनरल को शामिल करने के बाद है।"पीठ ने स्पष्ट किया कि वह केंद्र सरकार की दलीलों पर पूरी सुनवाई करेगी और पर्याप्त योग्यता मिलने पर ही मामले को एक बड़ी पीठ को भेजने पर विचार करेगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) जैसे न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं जतायीं। उन्होंने कहा कि अक्सर मेरिट सूचियों को भंग कर दिया जाता है और रिक्तियों को प्रतीक्षा सूची से भरा जाता है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता प्रभावित होती है।
इन आरोपों का जवाब देते हुए, अटॉर्नी जनरल ने बताया कि चयन कई कारकों को ध्यान में रखकर किया जाता है और कई उम्मीदवार मेरिट सूची में आने के बाद नियुक्ति से इनकार कर देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने कभी भी मेरिट सूची के बजाय प्रतीक्षा सूची से रिक्तियों को भरने का समर्थन नहीं किया है और प्रशासनिक आकस्मिकताओं के कारण कभी-कभी इसमें बदलाव होता है।
सुनवाई में अधिनियम के तहत अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु सीमा 50 वर्ष निर्धारित करने पर भी चर्चा हुई। अपने न्यायिक करियर का हवाला देते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें 42 वर्ष की आयु में उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था, और वर्तमान अधिनियम के मानदंडों के अनुसार, उन्हें अयोग्य माना जाता।
इससे पहले की सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने न्यायाधिकरण के सदस्यों के प्रशासन और सेवा शर्तों से संबंधित सरकार द्वारा जारी किये गये अध्यादेशों और वैधानिक प्रावधानों को चुनौती दी थी। इस मामले की आगे की सुनवाई बाद में की जाएगी।
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