वाराणसी , मार्च 29 -- मार्च-अप्रैल में बढ़ते तापमान के बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश के गेहूं किसानों के लिए समय पर कटाई करना सबसे प्रभावी उपाय बताया गया है। अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आईआरआरआई-एसएआरसी) के कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को फसल के पकाव पर नजर रखते हुए उचित समय पर कटाई करने की सलाह दी है, ताकि अंतिम चरण की गर्मी (टर्मिनल हीट) से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी यूपी में धान-गेहूं फसल प्रणाली के तहत गेहूं की बुवाई सामान्यतः मध्य नवंबर से मध्य दिसंबर के बीच होती है और कटाई मार्च के अंत से मध्य अप्रैल तक की जाती है। यदि बुवाई 1 से 20 नवंबर के बीच की जाए, तो दाना भरने की प्रक्रिया तेज गर्मी शुरू होने से पहले पूरी हो जाती है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता बेहतर रहती है।
कम या मध्यम अवधि (120-130 दिन) वाली किस्में मार्च के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के पहले सप्ताह तक कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। कटाई तब करनी चाहिए जब फसल शारीरिक परिपक्वता (फिजियोलॉजिकल मैच्योरिटी) पर पहुंच जाए-इस समय पत्तियां और बालियां पीली हो जाती हैं और दानों में नमी 18-20 प्रतिशत रह जाती है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि कटाई सुबह 7 से 11 बजे या शाम 4 से 7 बजे के बीच की जाए, ताकि दानों के झड़ने और नमी के नुकसान से बचा जा सके। वहीं लंबी अवधि (लगभग 150 दिन) वाली किस्में अप्रैल के पहले से तीसरे सप्ताह के बीच तैयार होती हैं, जिससे किसानों को चरणबद्ध तरीके से कटाई करने में सुविधा मिलती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि फसल पकने के बाद कटाई में देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अप्रैल की गर्मी और लू दानों के सिकुड़ने और उपज में कमी का कारण बन सकती है। देर से बोई गई फसल अक्सर अधिक तापमान के कारण पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
कटाई के तरीकों पर भी सुझाव देते हुए बताया गया कि हाथ से कटाई के बाद पूलों को 3-4 दिन तक खेत में सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए। वहीं कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई करने पर समय की बचत होती है, लेकिन मशीन की गति नियंत्रित रखना जरूरी है। फसल गिरने की स्थिति में कटर बार नीचे रखकर धीमी गति से कटाई करनी चाहिए।
भविष्य के लिए किसानों को जीरो टिलेज तकनीक अपनाने, समय पर बुवाई करने और विभिन्न अवधि वाली किस्मों का संतुलित चयन करने की सलाह दी गई है, ताकि बदलती जलवायु परिस्थितियों में उपज और गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जा सके।
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