जौनपुर , अक्टूबर 22 -- उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले के जमैथा गाँव में स्थित माता अखंडो देवी के मंदिर पर गोमती नदी के किनारे बुधवार को यमद्वितीया पर विशाल मेले का आयोजन किया गया , यह मेला 1904 से लग रहा है। यहां पर गोमती में स्नान करने के बाद माता अखंडो देवी का दर्शन-पूजन करते हैं ।
जौनपुर शहर से 05 किमी पूरब आदिगंगा गोमती के पावन तट पर स्थित जमैथा गाँव में ही भगवान् परशुराम के पिता महर्षि यमदग्नि ऋषि का आश्रम था , जहां वे अपनी पत्नी रेणुका के साथ रहते थे । परशुराम का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहॉपुर जिले में हुआ था , मगर उनकी तपस्थली व् कर्मभूमि जौनपुर जिले का जमैथा गाँव ही थी। यहीं पर अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान् परशुराम ने अपने फरसे से अपनी मां रेणुका का सिर काटा था , उनके पिता प्रसन्न हुए तो कहे कि परशुराम जो चाहो वरदान मांग लो ,तो परशुराम ने कहा कि यदि आप वरदान देना ही चाहते हैं , तो आप पुनः मेरी माँ को जीवित कर दीजिए।
महर्षि यमदग्नि ने रेणुका के सिर को उनके धड़ से जोड़ दिया तो वे जीवित हो गई । इस तरह पूरी सृष्टि में एक मात्र भगवान् परशुराम ही है , जो अपने पिता की आज्ञा मानकर पितृ ऋण व् अपनी माता को जिंदा करा कर मातृ ऋण से मुक्त ( उऋण ) हुए है । माता रेणुका जब पुनः जीवित हुई तो उनका नाम अखंडो हो गया , जो अब अखडो देवी के नाम से जाना जाता है ,इस समय वहां पर अखंडो देवी का मंदिर बना है ।
इसी स्थान पर एक परमहंस बाबा रहते थे । वे यही पर तपस्या करते और महर्षि यमदग्नि ऋषि जहां बैठ कर पूजा करते थे , वहीं एक दीपक जलाकर बाबा साधना करते थे , आज ही के दिन सन 1897 में बाबा परमहंस ने भी शरीर छोड़ा था , तो उस समय बाबा परमहंस ने गांव के निवासी ठाकुर चौहारजा सिंह से कहा था कि एक छोटी सी समाधि मेरी यही पर बनवा देना ताकि लोग मुझे याद करें जब बाबा परमहंस अपना प्राण त्याग रहे थे तो उस समय इतना तेज प्रकाश हुआ था कि जमैथा सहित आसपास के गांव में भी उजाला हो गया था , तब से लोग यहां पर यमद्वितीया के दिन मेला लगाने लगे और गोमती में स्नान कर माता अखंडो देवी का दर्शन कर पूजन करते है ।
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