वडोदरा , दिसंबर 03 -- गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने बुधवार को कहा कि जो कौमें अपने पूर्वजों के इतिहास को याद रखती हैं, वह हमेशा जीवित रहती हैं।

वडोदरा जिले में अपने अंतिम चरण में पहुंचने से पहले सरदारएट150 राष्ट्रीय एकता पदयात्रा प्रगतिशील गांव मोटा फोफल्या में आयोजित सरदार गाथा में विशेष तौर पर उपस्थित श्री देवव्रत ने सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए, 'बारडोली के सरदार' के रूप में उनकी भूमिका पर विशेष विचार व्यक्त किए। उन्होंने यहां उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यहां बैठे अधिकतर लोग मूल रूप से किसान हैं और उनके पूर्वज भी किसान रहे हैं।

बारडोली सत्याग्रह की पृष्ठभूमि समझाते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 1928 में अंग्रेजों का शासन था और किसानों की हालत अत्यंत दयनीय थी। उस समय अंग्रेजों ने खेती के लिए नहरें, बिजली या सड़क की कोई व्यवस्था नहीं की थी और बारिश न होने के कारण फसल भी नहीं होती थी। ऐसी स्थिति में अंग्रेज सरकार ने किसानों पर लगने वाला भूमिकर सीधे तीन से चार प्रतिशत से बढ़ाकर 22 प्रतिशत कर दिया और कुछ किसानों की जमीन पर तो यह टैक्स 60 प्रतिशत तक लगा दिया गया था। जब किसान यह टैक्स नहीं चुका सके तो अंग्रेजों ने उनके मवेशी और जमीनें भी छीन ली थीं।

राज्यपाल ने कहा कि इस कठिन समय में वल्लभभाई पटेल आगे आए और उन किसानों का नेतृत्व संभाला। उस समय वह एक सफल वकील थे और आरामदायक जीवन जी सकते थे, लेकिन उन्होंने देश सेवा के लिए अपनी वकालत छोड़ दी। वल्लभभाई पटेल किसानों के लिए बारडोली के गांव-गांव घूमे, जहां उन्होंने प्रत्येक किसान भाई और बहनों को एकत्र किया। उनका आत्मविश्वास जगाया और उन्हें एकता के सूत्र में बांधने का कार्य किया। उन्होंने लोगों को समझाया कि यदि हम संगठन शक्ति का परिचय देंगे और साहस दिखाएंगे, तो हम इस बड़ी ताकत को भी झुका सकते हैं।

उन्होने कहा कि सरदार पटेल की संगठन शक्ति के परिणामस्वरूप किसान वर्ग, विशेष रूप से बहनें, सत्याग्रह में डटकर खड़ी रहीं। अंग्रेजों ने बहुत डराया-धमकाया, परंतु किसान टस से मस नहीं हुए। इस आंदोलन की सफलता देखकर बारडोली की बहनों ने वल्लभभाई को 'सरदार' की उपाधि दी और वह तब से 'सरदार वल्लभभाई पटेल' के नाम से जाने गए। इसके बाद अंग्रेज सरकार को 22 प्रतिशत और 60 प्रतिशत किया गया कर घटाकर केवल 6.3 प्रतिशत करना पड़ा। यह सफलता केवल किसानों की विजय नहीं थी, बल्कि इससे पूरे देश में कमजोर पड़े अंग्रेज-विरोधी आंदोलन में नया जोश और नई शक्ति खड़ी हुई। गुजरात की इस पवित्र धरती ने जिस महापुरुष को जन्म दिया, जिन्होंने अपना पूरा जीवन 'राष्ट्रीय स्वाहा' कर दिया, ऐसे महापुरुष की 150वीं जयंती की पदयात्रा के कार्यक्रम में उपस्थित रहना गौरव की बात है।

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