जैसलमेर , नवम्बर 22 -- राजस्थान में विशेष गहन पुनिरीक्षण (एसआईआर-2026) में मतदाता सूची के सभी परिगणना प्रपत्रों का शत-प्रतिशत डिजिटलाइजेशन करके जैसलमेर पूरे राजस्थान में अव्वल आया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले के पांच बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) को इस बेहतरीन उपलब्धि के लिए राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया।

राजस्थान के जैसलमेर जिले का पाकिस्तान की सीमा के निकट सीमावर्ती शाहगढ़ क्षेत्र, जहाँ रेत का समंदर लहराता है, दूर-दूर तक बिखरी ढाणियाँ हैं, उदासीन हवाएँ चलती हैं, और जीवन की गति भी प्रकृति की कठोरता के साथ तालमेल बिठाकर ही आगे बढ़ती है, वहीं इन दिनों लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया को मजबूती देने का एक अभूतपूर्व प्रयास चल रहा है। इन विषम एवं दुर्गम परिस्थितियों में यह प्रयास है मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) -2026 के तहत हर योग्य नागरिक तक पहुँच कर उनका नामांकन सुनिश्चित करना। और इस कठिन अभियान को सफल बनाने का जिम्मा संभाल रहे हैं जैसलमेर जिले के जांबाज बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ)।

यह सिर्फ एक सरकारी कार्य नहीं, बल्कि दूरस्थ मरुस्थलीय जीवन में लोकतंत्र का दीप प्रज्वलित करने जैसा है। और इसकी सबसे प्रेरक मिसाल प्रस्तुत की है शाहगढ़ क्षेत्र के तीनों ग्राम पंचायत क्षेत्रों शाहगढ़, हरनाऊ और मांधला के बीएलओ ने, जहाँ की परिस्थितियाँ किसी भी सामान्य क्षेत्र से कई गुना अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। जैसलमेर के भाग संख्या 84 के बीएलओ करनैल सिंह की कहानी कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभाने का एक और उदाहरण है। उनके बूथ का क्षेत्र कई ढाणियों में बंटा हुआ है और इनके बीच काफी दूरी है।

कुछ मतदाता यहां से अन्यत्र बस गये थे, जिन तक पहुंचने के लिए उन्हें 60 किलोमीटर तक की यात्रा करनी पड़ी। यात्रा का कुछ हिस्सा रेगिस्तान के ऊँचे-ऊँचे टीलों पर पैदल तय किया गया। इसके बाद भी वह रुके नहीं। 19 नवंबर को कार्य शत-प्रतिशत पूरा करने के बाद उन्होंने स्वेच्छा से पड़ोसी बूथ स्तरीय अधिकारियों की गणना प्रपत्र भरने और डिजिटाइजेशन में मदद शुरू कर दी।

जिला प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार शाहगढ़ क्षेत्र पूर्ण रूप से थार मरुस्थल में स्थित है। इसका क्षेत्रफल करीब 6025 वर्ग किलोमीटर, राजस्व ग्राम 109 है। यहां की कई ढाणियाँ, जिनमें प्रति ढाणी मात्र चार या पांच परिवार रहते हैं। पास का कस्बा 150 किलोमीटर दूर है। यहाँ तक पहुँचना न केवल कठिन, बल्कि कई स्थानों तक केवल पैदल या ऊँट के सहारे ही संभव हो पाता है। कुछ ढाणियों तक वाहन जाने लायक रास्ते तक नहीं हैं। बीएलओ को कई बार 70-80 किलोमीटर लंबा क्षेत्र पार करना पड़ता है, और ऑनलाइन डेटा अपलोड करने के केंद्र तो कई बूथों से 80-90 किलोमीटर दूर हैं। वहीं बिजली और नेटवर्क करीब न के बराबर है। मतलब पूरा कार्य ऑफलाइन मेहनत, फिर केंद्र पर जाकर अपलोड करना।

एक बीएलओ ने बताया कि इस क्षेत्र के बीएलओ को कभी तपी रेत पर घंटों पैदल चलना, कभी ऊँट की पीठ पर सवार होकर ढाणियों तक पहुँचना, कभी स्थानीय जीप वालों की मदद से मुश्किल रास्तों को पार करना और कई बार बिना नेटवर्क, बिना बिजली, बिना संसाधनों के काम करना पड़ता है।

यहीं नहीं, यहाँ के अधिकतर लोग पशुपालक हैं, जो वर्ष में तीन बार ढाणियाँ बदलते हैं। सर्दियों में ज्यादातर लोग पलायन करके छोटे समूहों में बंट जाते हैं। इन ढाणियों में जाकर उन्हें समझाना, दस्तावेज इकट्ठा करना, फॉर्म भरवाना, परिवारों का सत्यापन करना, यह सब कार्य एक अत्यंत कठिन जिम्मेदारी है।

इन क्षेत्रों की सबसे बड़ी समस्या है फोटो। पास का कस्बा 150 किलोमीटर दूर, जहाँ जाना इनके लिए करीब असंभव है। इस स्थिति में बीएलओ ने स्वयं घर-घर जाकर मोबाइल से फोटो लेकर, फॉर्म भरकर एवं अपलोड कर इनकी समस्या का समाधान किया।

जिला प्रशासन के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार शाहगढ़ क्षेत्र के सरपंच और स्थानीय लोग मददगार प्रवृत्ति के हैं। उन्होंने बीएलओ को ऊँट, वाहन, भोजन-पानी एवं मार्गदर्शन के रूप में सहयोग दिया। इसी सामुदायिक भावना ने इस कठिन भूगोल में कार्य को संभव बनाया।

रेगिस्तान की तपती दोपहर हो या ठंडी हवाओं के बीच ढाणियों की दूरियाँ, इन बीएलओ ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने हर परिवार तक पहुँचकर नए मतदाता बनाए, सुधार किए, पलायन से लौटे परिवारों का डेटा अपडेट किया, बुजुर्गों का सत्यापन किया एवं लोकतंत्र के इस महापर्व में भागीदारी को सुनिश्चित किया। इनका कार्य केवल सूची अद्यतन नहीं, बल्कि थार के रेगिस्तान में लोकतंत्र की जीवंत मिसाल है.जिला कलेक्टर प्रताप सिंह ने कहा कि इन पांचों बीएलओ ने कार्यकुशलता, टीमवर्क, अनुशासन और समय पर काम पूरा करने का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि ने जैसलमेर को राज्य स्तर पर गौरवान्वित किया है और ये सभी बीएलओ अन्य के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

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