भोपाल , नवम्बर 19 -- मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के नवीन अध्ययन में राजधानी सहित ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य बीमा कवरेज की चिंताजनक स्थिति सामने आई है। अध्ययन में शामिल 428 परिवारों में से 33.6 प्रतिशत परिवार किसी भी स्वास्थ्य बीमा योजना से वंचित पाए गए हैं। रिपोर्ट में उल्लेख है कि शहरी क्षेत्रों में बिना बीमा वाले परिवारों का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक है।
यह अध्ययन प्रोफेसर डॉ. जीवन सिंह मीणा के मार्गदर्शन में डॉ. कुलदीप गुप्ता द्वारा किया गया जिसमें औबेदुल्लागंज के 214 ग्रामीण और लेडी भोर केंद्र कैचमेंट क्षेत्र के 214 शहरी परिवार शामिल थे।
अध्ययन में पाया गया कि आयुष्मान भारत योजना सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली योजना है, लेकिन पात्रता होने के बावजूद अनेक लोगों के आयुष्मान कार्ड नहीं बन सके। प्रतिभागियों ने बताया कि बायोमेट्रिक मिलान में दिक्कत, आवश्यक दस्तावेजों की कमी, समग्र आईडी से संबंधित समस्याएं और जानकारी का अभाव आयुष्मान कवरेज बढ़ाने में प्रमुख बाधा हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 56 परिवार और शहरी क्षेत्रों में 88 परिवार किसी भी बीमा योजना से बाहर हैं। यह स्थिति शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुरक्षा की कमजोर स्थिति को रेखांकित करती है। अध्ययन में शामिल 240 प्रतिभागी आयुष्मान भारत योजना से जुड़े पाए गए जबकि निजी स्वास्थ्य बीमा वाले प्रतिभागियों की संख्या केवल 33 रही।
अध्ययन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में बीमा संबंधी जानकारी का प्रमुख स्रोत स्वास्थ्यकर्मी हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में प्रतिभागियों को बीमा की अधिकतर जानकारी परिवार, मित्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त होती है।
प्रतिभागियों में से अधिकांश ने बताया कि उनके परिवार के सभी सदस्य बीमा योजनाओं में शामिल हैं और योजना से उन्हें वास्तविक लाभ मिला है। कई प्रतिभागियों ने यह भी कहा कि योजना में अधिकांश बीमारियां कवर होने से आर्थिक सुरक्षा की भावना बढ़ी है।
अध्ययन रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि आशा, एएनएम और एमपीडब्ल्यू जैसे कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जाए। अस्पतालों में स्वास्थ्य योजनाओं से संबंधित सूचना सामग्री स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाए और ग्रामीण व शहरी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पृथक जागरूकता रणनीतियां तैयार की जाएं।
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