नयी दिल्ली , दिसंबर 03 -- संसद में बुधवार को मणिपुर से संबंधित एक सांविधक संकल्प पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने जल प्रदूषण के छोटे अपराधों में सजा का प्रावधान समाप्त कर अर्थ दंड की व्यवस्था करने के लिए केंद्र की आलोचना की।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यसभा में इस संकल्प को पेश करते हुए बताया कि संसद ने जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) संशोधन अधिनियम को छोटे अपराधों के निरपराधीकरण और सुगम जीवन और कारोबार की सुगमता के लिए विश्वास पर आधारित शासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अधिनयमित किया था। उन्होंने कहा कि मणिपुर में 13 फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन लागू है और इसलिए राज्य में इसे लागू करने के लिए यह सांविधिक संकल्प लाया गया है।
इसका विरोध करते हुए राजस्थान से कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने कहा कि संसद द्वारा पारित अधिनियम ही अपने-आप में पूर्ण नहीं है। विधेयक में दंड के प्रावधानों को कमजोर किया गया है। कई गंभीर उल्लंघनों पर जेल की सजा का प्रावधान समाप्त करके जुर्माने का प्रावधान किया गया है जो बड़ी कंपनियों को जानबूझकर नियमों के उल्लंघन के लिए प्रोत्साहित करेगा क्योंकि उनको दंड से ज्यादा मुनाफा होगा।
उन्होंने कहा कि जल की गुणवत्ता परीक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले ज्यादातर बोर्ड प्रयोगशालाओं और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। जब तक डिजिटल डाटा की प्रामाणिकता सुनिश्चित नहीं की जाती मैन्यूअल डाटा संग्रह पर ही भरोसा करना चाहिये। उन्होंने मांग करते हुए कहा कि सरकार को प्रदूषण से प्रभावित लोगों के लिये मुआवजे की व्यवस्था भी करनी चाहिये।
पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव ने कहा कि जो संकल्प मणिपुर की विधानसभा में लाया जाना चाहिये था वह संसद में लाने की जरूरत पड़ी है क्योंकि मणिपुर की विधानसभा को भंग कर दिया गया है और वहां चुनाव नहीं कराये जा रहे हैं। उन्होंने कहा, "यदि आप सचमुच मणिपुर की मदद करना चाहते हैं तो वहां चुनाव कराइये।"तमिलनाडु से द्रमुक के सदस्य पी. विल्सन ने सवाल किया कि कब तक विधानसभाएं भंग रहेंगी और उनके लिए संसद में विधेयक पारित किये जाते रहेंगे। उन्होंने दिल्ली में अत्यधिक प्रदूषण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजधानी आज गैस-चैंबर बन चुकी है। दिल्ली में हर सात में एक मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है।
उन्होंने जाड़े के मौसम में संसद का सत्र आयोजित करने से बचने और मंत्रालयों को अलग-अलग राज्यों में रखने की सलाह दी। साथ ही यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय की पीठ विभिन्न शहरों में भी हों ताकि दिल्ली पर दबाव कम हो सके।
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