रांची , मई 03 -- झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आगामी जनगणना 2027 में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम/कोड का प्रावधान करने का आग्रह किया है।

श्री सोरेन ने इस मुद्दे को आदिवासी समाज की पहचान, भावनाओं और राज्य की आकांक्षाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया है।

मुख्यमंत्री श्री सोरेन ने अपने पत्र की शुरुआत प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हुए लिखा कि वैश्विक चुनौतियों के बीच देश की प्रतिष्ठा बनाए रखने, आर्थिक मजबूती और आंतरिक सुरक्षा के बेहतर संचालन में केंद्र सरकार की भूमिका सराहनीय रही है। साथ ही उन्होंने 2027 में जनगणना शुरू करने के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन विभिन्न आपदाओं के कारण इसे टालना पड़ा।

श्री सोरेन ने पत्र में कहा कि किसी भी देश के संतुलित और समावेशी विकास के लिए तथ्य आधारित नीति निर्माण अत्यंत आवश्यक है और जनगणना इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। उन्होंने बताया कि झारखंड सरकार जनगणना 2027 की पूरी प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग कर रही है और उन्होंने स्वयं भी स्व-गणना कर इस अभियान में भागीदारी निभाई है।

पत्र में श्री सोरेन ने जनगणना की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए बताया कि पहले चरण में घर-परिवार से संबंधित आंकड़ों के साथ यह दर्ज किया जाएगा कि संबंधित व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति से है या नहीं, जबकि दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक के व्यक्तिगत आंकड़ों का विस्तृत संकलन किया जाएगा। इसी दूसरे चरण में धर्म से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जानी है, जिसे लेकर उन्होंने सरना धर्म के लिए अलग कोड की मांग दोहराई है।

मुख्यमंत्री श्री सोरेन ने कहा कि सरना धर्म आदिवासी समाज की विशिष्ट धार्मिक पहचान है, जिसमें प्रकृति पूजा, ग्राम देवता, कूल देवता, अलग पूजा पद्धतियां, पारंपरिक त्योहार और पुजारियों द्वारा की जाने वाली पूजा व्यवस्था शामिल है। ये सभी विशेषताएं इसे एक अलग और स्वतंत्र धार्मिक पहचान प्रदान करती हैं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आजादी से पहले जनगणना में विभिन्न समुदायों की धार्मिक पहचान और परंपराओं को अलग-अलग दर्ज किया जाता था, लेकिन स्वतंत्र भारत में आदिवासी समाज के धर्म को अलग से अंकित करने की परंपरा नहीं रखी गई। इसके बावजूद वर्ष 2011 की जनगणना में देश के 21 राज्यों के लगभग 50 लाख लोगों ने स्वेच्छा से "सरना" को अपने धर्म के रूप में दर्ज कराया था, जो इसकी व्यापक मान्यता और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।

श्री सोरेन ने कहा कि जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उनके गहन विश्लेषण का भी माध्यम है, जिसका उपयोग नीति निर्धारण, कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण, संवैधानिक संरक्षण और प्रशासनिक निर्णयों में किया जाता है। यदि किसी समुदाय से जुड़े आंकड़ों का सही और समुचित संकलन नहीं होता है, तो उस समाज के विकास से जुड़ी नीतियों पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि झारखंड राज्य का गठन ही आदिवासी पहचान के आधार पर हुआ है और राज्य की नीतियां व योजनाएं स्थानीय समुदायों, विशेषकर आदिवासी समाज की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ऐसे में जनगणना में इन सभी पहलुओं का समुचित समावेश आवश्यक है।

तकनीकी दृष्टि से देश के सशक्त होने का उल्लेख करते हुए श्री सोरेन ने कहा कि वर्तमान समय में जब अधिकांश कार्य डिजिटल माध्यम से किए जा रहे हैं, तब धर्म के कॉलम में सरना धर्म या अन्य समान धार्मिक पहचान को अलग कोड देने से आंकड़ों का बेहतर और सटीक संकलन संभव हो सकेगा।

श्री सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध किया कि जनगणना 2027 के द्वितीय चरण में धर्म से संबंधित कॉलम में सरना धर्म (साथ ही अन्य समान धार्मिक व्यवस्थाओं) को अलग कोड प्रदान करने का निर्देश दिया जाए, ताकि आदिवासी समाज की पहचान को संरक्षित और सम्मानित किया जा सके। उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्र सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करेगी।

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