रायपुर , दिसंबर 03 -- छत्तीसगढ़ में लागू नई कलेक्टर दरों ने पूरे प्रदेश में भू-अधिकारियों, कारोबारियों और आम लोगों के बीच गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। संशोधित गाइडलाइन के बाद कई क्षेत्रों में जमीन के दाम पांच से नौ गुना तक बढ़ने की खबरों ने रियल एस्टेट सेक्टर को हिला दिया है। इस बढ़ोतरी को लेकर राज्य में राजनीतिक और आर्थिक बहस छिड़ गई है।

रायपुर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने बुधवार को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर इस निर्णय को तुरंत स्थगित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इतनी भारी वृद्धि से प्रदेश में भूमि क्रय-विक्रय लगभग रुक जाएगा। उनके मुताबिक नई दरों से भूमि अधिग्रहण में अधिक मुआवजा मिलने का तर्क भ्रामक है, क्योंकि इससे केवल चुनिंदा किसानों को लाभ होगा, जबकि अधिकांश जनता पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ेगा।

श्री अग्रवाल ने आरोप लगाया कि बिना किसी व्यापक जन-परामर्श के की गई यह वृद्धि किसानों, व्यापारियों और मध्यमवर्ग पर असमान बोझ डाल रही है। उन्होंने कुछ क्षेत्रों के उदाहरण भी दिए जहाँ भूमि मूल्य असाधारण रूप से 'लाभांश में लगभग 725 प्रतिशत तक और निमोरा में करीब 888 प्रतिशत तक बढ़े।

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। पार्टी के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि जमीन की दरों में की गई वृद्धि समझ से परे है। उनका कहना है कि सरकार की जिद और कुछ मंत्रियों की मनमानी ने रियल एस्टेट सेक्टर के सामने संकट खड़ा कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम लोगों की परेशानियों पर सरकार गंभीर नहीं है।

राज्य में पहले भूमि मूल्यांकन में 30 प्रतिशत की छूट दी जाती थी, जिसके बाद पंजीयन शुल्क चार प्रतिशत (जमीन) और दो प्रतिशत (75 लाख तक के मकान) लिया जाता था। नई व्यवस्था में यह छूट हटा दी गई है और संपत्ति का शत-प्रतिशत मूल्य ही तय मानक बनेगा लेकिन शुल्क दरों में कोई कमी नहीं की गई है।

व्यवसायियों और रियल एस्टेट से जुड़े संगठनों का कहना है कि जब जमीन का मूल्यांकन 100 प्रतिशत कर दिया गया है, तो पंजीयन शुल्क भी उसी अनुपात में घटाया जाना चाहिए। उनका सुझाव है कि चार प्रतिशत की दर को घटाकर लगभग 0.8 प्रतिशत किया जाए, ताकि बढ़े हुए मूल्य का प्रभाव संतुलित रहे और आम जन पर अतिरिक्त भार न पड़े।

राज्य में नई गाइडलाइन लागू होने के बाद पूरे राज्य में विरोध की आवाजें उठ रही हैं। कई व्यापारिक संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ने इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया, तो आने वाले महीनों में रियल एस्टेट बाजार पूरी तरह ठप पड़ सकता है।

प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों और जनता की क्षमता को देखते हुए विशेषज्ञ भी शुल्क संरचना की समीक्षा को आवश्यक मान रहे हैं।

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